Archive | November 2017

Gita Jayanti Mahotsav Inauguration

On 27th Nov 2017 evening, Poojya Guruji Swami Atmanandaji and P. Swamini Amitanandaji inaugurated the week-long Gita Jayanti Mahotsav at Agrasen Dham (Phooti Kothi). They lighted the lamp amidst the chanting of shlokas. Poojya Guruji also released a book on Gita written by Dr Raja Ram Gupta. Poojya Guruji said that we all should become like Arjun, who choose Bhagwan Sri Krishna instead of power & prosperity. May he become the Saarthi of the chariot of our lives too. Later P. Swaminiji also addressed the gathering.

Gita Gyana Yagna, Jalgaon

A week-long GITA GYANA YAGNA by Poojya Swamini Poornanandaji was organized at Dutta Mandir, Ashok Nagar, Jalgaon – from 24th to 30th Nov 2017. In this twin discourse Marathi pravachan series she is giving discourses on the 9th Chapter of Bhagwad Gita and Bhaja Govindam – 2.

This entry was posted on November 27, 2017, in GGY, Mission.

हनुमान चालीसा सत्संग : नवंबर २०१७

नवंबर २०१७ माह का अंतिम रविवार दिनांक २६ को था। इस दिन आश्रम में सायंकाल हनुमान चालीसा सत्संग का मासिक कार्यक्रम था। कार्यक्रम का शुभारम्भ दास बगीची के भक्तों द्वारा सुन्दर भजनों से हुआ।  पूज्य गुरूजी के व्यास पीठ पर पधारने और उनके स्वागत के उपरांत श्री गुलाब चंद व्यास जी ने एक सुन्दर भजन (हरि को भेज ले प्राणी) प्रस्तुत किया और फिर सबने हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया। उसके बाद पूज्य गुरूजी का सवा घंटे का प्रवचन हुआ, जिसमे उन्होंने चालीसा की २२वें चौपाई – सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक कहु को डरना।। – पर प्रवचन किया।

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अपने उद्बोधन में पूज्य गुरूजी ने कहा की इस चौपाई में मनुष्य की दो अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रचलित आवश्यकताओं की पूर्ती के बारे में  गोस्वामीजी सूत्र प्रदान करते हैं। ये हैं सुख और सुरक्षा की प्राप्ति की इच्छा । वे कहते हैं की जो भी हनुमानजी की शरण में जाता है उसे सब प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते हैं – सब सुख लहै तुम्हारी सरना। और जब आप हमारे रक्षक हैं तो हमें किसी बात का डर नहीं है, अर्थात हम सुरक्षित भी हो जायेंगे। ज्यादातर प्रत्येक मनुष्य इन्ही दो आवश्यकताओं के बारें में चिंतित होता रहता हैं और यथासंभव जुगाड़ भी करता रहता है। लेकिन विडम्बना यह है की जीवन भर इस के लिए कार्य करने के बावजूद पर्याप्त सुख और सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है। हमारा प्याला कुछ खाली बचा ही रहता है। अतः यह बिंदु अन्यन्त गंभीर और विचारणीय है। यह तो हम सबके जीवन का ही प्रश्न है। अब सोचना यह है की हम हनुमानजी की शरण में जाएँ तो हमें यह दोनों कैसे प्राप्त हो जायेंगे, क्या देवता लोग ही किसी के जीवन में किसी चीज़ के भाव-आभाव के हेतु होते हैं, क्या किसी गरीबी आदि के किये भगवान जिम्मेदार होते हैं, और अगर हम उनके शरण में चले गए तो वे अपना आदमी देख कर हमें सुखी आदि कर देते हैं। भले दुनियां में हम ऐसा देखते हैं की किसी नेता अथवा सेठ आदि के साथ जुड़ जाएँ तो वे भी हमारी आवश्यकताओं को देख लेते हैं, लेकिन ईश्वर के बारे में ऐसा सोचना उचित नहीं है। हम अपनी आँख ठीक से खोले तो सब को दिखता है की हम सब पर ईश्वर की अपार कृपा बरस रही है। कमी हमारे तरफ से है। हमारा अभाव और असुरक्षा हमारे मन से समस्याएं हैं, जिसे हमें ही ठीक करना होता है। ऐसे अनेकानेक दृष्टांत दुनिया में विराजमान हैं जिन्होंने अपने जीवन में अनेकानेक समस्यों और अभावों के बावजूद ने साहस और बुद्धिमत्ता से अपने जीवन में उत्कर्ष उत्पन्न कर लिया। इसलिए हमारी शरणागति ईश्वर के कर्तव्य का विधान और निरूपण नहीं है, बल्कि हमारे मन में कुछ परिवर्तन का सूचक है। अगर देवता लोग भी किसी की व्यक्तिगत सेवा और शुश्रुषा के वजह से ही हमारी देख भाल  करते हैं तो वे भी स्वार्थ और राग-द्वेष से कलुषित हो जायेंगे और वे भी सामान्य व्यक्तियों की तरह विकारी हो जायेंगे। अतः शरणागति कुछ हमारे अंदर ही परिवर्तन की सूचक और औषधि है।

हम लोग जिसके भी प्रति शरणागत होते हैं उसके गुणों का अपने अंदर समावेश होने लगता है। वे स्वाभाविक रूप से हमारे आदर्श होते हैं। हम लोग स्वाभाविक रूपा से उनके आचार और विचार का अनुकरण करने लगते हैं, और इस तरह से उनके गुणों का समावेश अपने अंदर होने लगता है, और यह ही सबसे महत्वपूर्ण बात होती है। अब अगर हम हनुमानजी के प्रति समर्पित होते हैं तो उनके जैसी रामजी के प्रति शरणागति, साहस, निडरता, विनम्रता और बुद्धिमत्ता आदि देख कर, उसी रंग में रंगने लगते हैं। ईश्वर जब हम सब पर कृपा करते हैं तो हमें बिना कर्म के कोई फल नहीं देते हैं, वे हमें कर्म करने की कला और प्रेरणा देते हैं, और बाकि सब तो फिर स्वतः प्राप्त हो जाता है। अपने मन के परिवर्तन से वस्तुतः समस्या ही नहीं रहती है, और इस तरह से मनो हमारे प्रभु हम पर कृपा कर देते हैं। बस इसके लिए हमे शरणागति का रहस्य समझना चाहिए। वेदांत में जिसे निषेध कहते हैं उसे ही भक्ति शास्त्र में शरणागति कहते हैं। वेदांत कहता है की जब जीव-भाव का निषेध होता है तभी ब्रह्म-स्वरुप आत्मा का साक्षात्कार होता है। भक्ति शास्त्र शनै-शनै हमारे जीव-भाव को शिथिल करते हुए निवेदित करा देता है। अतः उसका रहस्य ठीक से जानना आवश्यक है।

शरणागति के छे अंग होते हैं। कहा गया है : अनुकुलस्य संकल्पः, प्रतिकुलस्य वर्जनं, राक्षिष्यति इति विश्वासः। गोप्तृत्वे वारणं तथा, आत्म-निक्षेप, कार्पण्ये, शरणागति षड्विधा। अर्थात हमारे इष्ट के लिए जो भी अनुकूल है उस अनुकूल कार्य को करने का निश्चय ; उन्हें जो भी अच्छा नहीं लगता है उस प्रतिकूल कार्य आदि से दूर रहना ; अपने मन में पूर्ण विश्वास होना की वे हमारी रक्षा करेंगे ; अपने इष्ट देवता को ही अपना पालक और स्वामी समझना ; उनके प्रति पूर्ण समर्पण होना, अर्थात जब भी हम उनकी सन्निधि में हों अथवा उनका स्मरण भी करें तब हमारे सब अभिमान समाप्त होते दिखाई पड़ें, अंदर तक एक हलकापना आ जाये, ये आत्म-निक्षेप है ; और अंतिम गुना सरलता और निरभिमानता का सूचक है। जिसमे भी ये गुण आते हैं वो ही शरणागति की साधना के पथ पे चलता है। ऐसा व्यक्ति न केवल अपने राग और द्वेष दूर करने लगता है बल्कि अभिमान को भी दूर करने लगता है। और साथ ही साथ अपने इष्ट के गुणों, ज्ञान, और भक्ति आदि को भी अपने अंदर समाविष्ट करने लगता है। इस तरह से उसका मन आमूल परिवर्तित हो जाता है। ऐसे मन में एक दिव्य शांति और सुख स्वाभाविक रूप से ही होता है। उसे किसी का भी डर नहीं रह जाता है, और वो अन्यन्त सुरक्षित महसूस करने लगता है। इस तरह से गोस्वामीजी की ये बात सार्थक हो जाती है की सब सुख लहे तम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना। हमारे भगवान् सीधे कुछ न करने के द्वारा कितना कुछ कर देते है, भक्त इस परिवर्तन का श्रेय भी अपने भगवन को ही देता है, और ज्यादा विनम्र और शरणागत हो जाता है। मन जितना शांत और निर्मल होता है, उतनी ही बुद्धि और विकसित होने लगाती है, और वो वेदांत प्रतिपादित जीव-ब्रह्म के रहस्य गहरायी से समझने लगता है और अपने प्रफु से अंततः एक होक जीता है – ऐसे व्यक्ति को तो परम सुख का अक्षय भंडार मिल जाता है और वो पूर्ण सुरक्षित भी हो जाता है। पूज्य गुरूजी ने अनेकानेक सुन्दर एवं सरल दृष्टांतों से ये सब बातें बताई।

अंत में सबने मिलकर प्रेम से हनुमानजी की आरती करी तथा प्रसाद ग्रहण कर प्रस्थान किया।

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Video Satsang: From Upasana to Gyana

A new Video Satsang of Poojya Guruji Swami Atmanandaji was published on 21st Nov 2017. In this Hindi language Chintan series satsang, a visitor to Ashram, Col KM Rai asks a question that he has been lately meditating on the principle that everything is basically Brahman, and this has been a great blessing to him. It has helped resolve many knots within, however, he confesses that inspite of this deep down he still continued to feel a lack – something is still missing. This is what has been answered. We have named this episode as Ishwar Upasana and After.

While appreciating his sincere efforts to believe in the basic divinity of all, including himself, he tells that as long as our Jiva-Bhava, or limited individuality exists so long being one with the limitless or infinite is not possible. The fragmentation has been caused not by Brahman but by our perception of limited identity. So the next phase of sadhana is to focus on the truth of our Self. The moment we discover clearly, rather than just believe, that all limitations are imaginary, they shall fall, and the Berlin Wall too shall fall. One needs to see that the very fact that we seek, reveals our limited identity, and as long as we ourselves are limited, so long Ishwar will be away, and no amount of feeling of oneness will help. So the way out is self-exploration. This is what Atma-Anatma Viveka is all about.

When we turn the focus on our identity, we discover that all limitations which we see are just superimpositions of the dharma of our faculties on our self. When two things are in close proximity and we are not clear about their truth then there are great chances of anyonya-adhyasa – superimposition of the characteristics of one on the other. This is just perceptual error, it is just an imagination. Whenever this is the nature of problem, then the solution is to clearly see the truth of both the involved components. So one needs to deeply observe & analyse. Taitiriya Upanishad talks about five layers of our personality – the so called our body-mind complex. He briefly talks about these so called Panch Koshas, and then says then as & when you yourself see that all these are the dharma of your faculties and not you per se, then that very moment all imaginary limitations shall drop, and with this all our divorce with infinite consciousness shall also end. Do check out this profound discussion or Satsang.

Do let us know of your feedback by pressing the Like button on the YouTube Channel, and also press the Subscribe button to immediately get informed about our publications. Freely share such resources with your friends and family members interested in such things.

This entry was posted on November 22, 2017, in vdo-satsang.

Video Satsang: Samarth Ramdas ji Maharaj

In the Video Satsang project of Vedanta Ashram, Poojya Swamini Poornanandaji started a series on Maharashtra ke Sant – in Marathi language. In this series the first episode was on Samarth Ramdasji Maharaj. She talked about his life and teachings, and hoped that better knowledge of these enlightened masters will not only make people proud of their rich heritage but also prompt them to study their works and ultimately become aware of the one substratum of the entire creation – as their own self.

Knowledge of the truth of Self and the world alone helps us transcend the ego, which creates all kinds of stress and conflicts in the life of the person, and then in the whole society.

Do watch the episode, and after watching it do press the LIKE icon, and also SHARE it with your friends and family. Let us spread the goodness around. You may also SUBSCRIBE to our VedantaAshram Channel, so that you get the information of all subsequent episodes.

This entry was posted on November 22, 2017, in vdo-satsang.

New Ashram Project: Video Satsangs

Vedanta Ashram started a new program of preparing and publishing Video Satsangs. In these Video Satsangs, Ashram Mahatmas discuss on any one topic of general interest and these are recording in a make-shift studio made at the Ashram. These videos are edited at the Ashram itself, and later published on the YouTube in its Vedanta Ashram Channel. In a short span of a month we have published five Video Satsangs. Two of Poojya Guruji Swami Atmanandaji, two by P. Swamini Amitanandaji and one by P. Swamini Samatanandaji. A series of talks are in the pipeline, by P. Swamini Poornanandaji also on the topic of ‘Maharashtra ke Sant’.

Ist Vdo Satsang: Prarabdha aur Purushartha – in Hindi:

In our first such publication, we prepared and published a Hindi language video of Poojya Guruji Swami Atmanandaji. It was on the topic of Prarabdha & Purushartha, meaning, Is the direction of our life pre-determined by Fate / God’s Will / Prarabdha, or do we have any Free-Will too, to steer the direction of our lives. This is a very commonly asked question, and the lack of clarity on this topic makes so many people wish to somehow get a peek into their already written fate, and also manipulate it, if possible. It is a very important topic to be very clear about.

2nd Vdo Satsang: Who am I – in Hindi?

In this second release, Poojya Guruji Swami Atmanandaji is asked a question, as to how do we go about knowing our Self. Koham – Who am I? This question is the essence of the message & teachings of Upanishads. He says that in this journey of realizing the truth of ourself, we need to begin with first negating all that we clearly know all that which we are not. Taittiriya Upanishad talks about five layers or Koshas of our personality. Not knowing the truth of our Self, we identify with these koshas and thus create our false identity. A seeker of truth needs to clearly see that I am none of these, these are just our faculties. Once we negate the notion of ourself being these koshas, then alone the clouds get cleared to realize the sun-like self.

3rd Vdo Satsang: Ishwar-Darshan – in English:

In this Video Satsang publication, P. Swamini Samatanandaji answers a question about – How to get darshan of Ishwar? This is in English language. In this satsang P. Swaminiji says that there are different kinds of darshan.

One, pratyaksha, in which we perceive an object by our sense organs. Anything seen by our sense organs is limited, inert and also perishable. Obviously we cannot see God by this way.

Two, the second kind of darshan is intellectual, like in the famous example of smoke & fire. Whenever we see an effect, we definitely know that a cause is also definitely there. This is intellectual seeing. So when we see this beautiful creation then we can easily infer the presence of its creator. Moreover, every creator has to obviously fully knows its creation, so the creator of this entire creation has to be omniscient, and in order to translate the knowledge into a creator, he obviously must have appropriate power & capacity to do so, so Ishwar, the creator has to be omnipotent too. So when we see the world, we ‘see’ God, in this intellectual way.

Three, there is a third kind of ‘seeing’ also, this is neither pratyaksha nor intellectual, but direct. It is called Aparoksha. Like ‘seeing’ our own Self. We don’t see our Atma, by our sense organs nor do we infer its existence by inference etc, i.e. intellectually. Even when our eyes etc are closed, and our mind is quiet, still we know our existence. This is called aparoksha-anubhuti – direct, immediate ‘seeing’. As Ishwar himself says that ‘I am the Self of all’, so God has to be realized as our very Self, that is the way to get Ishwar-Darshan. Of course in this kind of seeing, I the limited individual has to be completely negated.

4th Vdo Satsang: Ishwar Krupa – in Hindi:

Another often asked question by devotees is how to invoke more Ishwar Krupa, so as to make our lives more happy & comfortable. In this fourth release P. Swamini Amitanandaji answers a question to this effect. This Satsang is in Hindi language. She says that there are three subjective adjustments by which we can open the doors of our mind to experience infinite blessings of God.
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One, fully & sincerely believing that ‘every’ situation has blessing in it, because it comes from God himself;
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Two, examining our own parameters by which we see only some situations alone as good or bad; and 
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Three, re-visiting the notions of our own identity – whether notions of our being limited, and thus endlessly expecting, is our truth; or deep-down we are complete – as the Upanishads say, thus making the very expectations baseless.

5th Vdo Satsang: Ishwar-Krupa – in Gujarati:

P. Swamini Amitanandaji talks about invoking Ishwar Krupa – in Gujarati language. She says that there are three subjective adjustments by which we can open the doors of our mind to experience infinite blessings of God.
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One, fully & sincerely believing that ‘every’ situation has blessing in it, because it comes from God himself;
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Two, examining our own parameters by which we see only some situations alone as good or bad; and 
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Three, re-visiting the notions of our own identity – whether notions of our being limited, and thus endlessly expecting, is our truth; or deep-down we are complete – as the Upanishads say, thus making the very expectations baseless.

 

This entry was posted on November 18, 2017, in vdo-satsang.

Vedanta Sandesh – Nov 2017

The Nov 2017 edition of Vedanta Sandesh is the English monthly eMagazine of International Vedanta Mission, containing inspiring and enlightening articles of Vedanta & Hinduism, and news of the activities of Vedanta Mission & Ashram – has been published. You can check it out from the links below:

Links:  Vedanta Sandesh is available on all of the following sites, and can be either downloaded or read online.

  1. Issuu

  2. Scribd

  3. GDocs

  4. Box

Getting VS in your Folder directly: Now that we have Google Drive , our subscribers with Gmail can get the VS directly in their Google Drive Folder – the moment it is published. Interested people can let us know so that we can add their email id’s in Direct Share Facility.

Vedanta Sandesh is a free magazine, and you are welcome to share it with your friends & relatives. May the good values & vision spread to bless the lives of one & all.

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This entry was posted on November 2, 2017, in Magazines.

हनुमान चालीसा सत्संग : अक्टूबर २०१७

अक्टूबर महीने का हनुमान चालीसा सत्संग का कार्यक्रम दिनांक  २९ अक्टूबर को वेदांत आश्रम के शंकराचार्य सभागृह में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का प्रारम्भ पूर्ववत सुन्दर  भजनों  से हुआ, और फिर सबने हनुमान चालीसा का पाठ  किया। तदुपरांत  पूज्य गुरूजी ने हनुमान चालीसा की २२ वीं  चौपाई पर अपना प्रवचन प्रारम्भ किया – सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक कहु को डरना। 

उन्होंने कहा की जो भी हनुमानजी की शरण में जाता है उसे सब प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते हैं, तथा उसके सब प्रकार के डर भी समाप्त हो जाते हैं। इस चौपाई में एक बहुत मूलभूत बात कही जा रही है।  एक तो प्रत्येक मनुष्य सुख और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए सतत लगा रहता है, दूसरी बात यह है, की ये दोनों चीजें हमारे अभिमान के करना ही अप्राप्य हो जाती हैं, न की किसी बाहरी कारणों  से, और जैसे ही मनुष्य शरणागति की अंतःस्थिति को प्राप्त करता है फिर मनो जिसके प्रति वो शरणागत होता है वो देवता उसे इन दोनों जरूरतों को पूरा कर देता है। सुख और सुरक्षा की प्राप्ति का रहस्य शरणागति के रहस्य में छुपा हुआ है। स्वामीजी ने हनुमानजी के अनेकानेक भक्तों के दृष्टांत दिए जिन्होंने हनुमानजी के प्रति शरणागति के करना जीवन में अकल्पनीय सुख और समृद्धि प्राप्त की। उनमे गोस्वामी तुलसीदास जी भी शामिल हैं, आधुनिक काल में एप्पल कंपनी के स्टीव जॉब्स भी हनुमानजी के ऐसे ही भक्तों में एक हैं।  वे नैनीताल के पास स्थित नीमकरोली बाबा के आश्रम में रहे थे और बाबाजी हनुमानजी के बहुत बड़े भक्त थे, उनके जीवन में उनकी कृपा से बहुत बड़ा परिवर्तन आया।

जब तक मनुष्य मूलभूत सुख और सुरक्षा प्राप्त नहीं कर लेता है तब तक वह निःस्वार्थ नहीं हो पता है, और जब तक निःस्वार्थ नहीं होता है तब तक वो अच्छा और बड़ा सोच भी नहीं पता है।  इस लिए इन दोनों आवशयक्ताओं की पूर्ती जीवन के साफल्य के लिए अत्यंत आवश्यक होती हैं। पूज्य गुरूजी ने कहा की – शरणागति क्या होती है और कैसे करि जाती है – इस विषय में हम लोग अगली सत्र में प्रवेश करेंगे।

इसी दिन अभी दो दिन पूर्व समाप्त हुए गीता ज्ञान यज्ञ के उपलक्ष्य में एक भंडारे का भी आयोजन हुआ। विशेष प्रसन्नता की बात यह थी की उस दिन आंवला नवमी का शुभ पर्व भी था, इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा होती है और इसके निचे बैठ के भोजन भी किया जाता है। इसके बारे में कथा आती है की इस दिन आंवले के पेड़ में भगवन विष्णु और शिवजी दोनों का वास होता है। आश्रम में एक आंवले के पेड़ की व्यवस्था की गयी और उसकी पूजा की तैयारी भी की गयी, अनेकों भक्तों ने पूजा का आनंद लिया और सुंदरता से सजाय गए पेड़ की परिक्रमा की। बाद में श्री सुनील गर्ग जी के द्वारा सभी को भंडारे प्रसाद का आयोजन किया गया।

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