मंदिरों का आध्यात्मिक विकास में योगदान

आध्यात्मिक विकास मूल रूप से मात्र ज्ञान से सम्भव होता है, लेकिन तत्त्व ज्ञान के किये एक सात्त्विक, सूक्ष्म और संवेदनशील मन की आवश्यकता होती है। यह ही विविध साधनाओं का प्रयोजन होता है। ईश्वर शब्द का वाच्यार्थ अर्थ देखने से आवश्यक गुण प्राप्त हो जाते हैं। जो वाच्यार्थ को नहीं देख सकता उस के लिए लक्ष्यार्थ देखना तो कल्पना मात्र है। सनातन धर्म में ईश्वर शब्द का प्रारम्भ में वाच्यार्थ देखने की बहुत महिमा होती है। हम लोगों के अनेकानेक मंदिरों का यह ही प्रयोजन होता है। जब कोई श्रद्धालु मंदिर जाता है तो ईश्वर का विग्रह देख के मन में अनेकों परिवर्तनों की संभावना होती है – जो की हम लोगों के आध्यात्मिक विकास में महत्व पूर्ण योगदान देते हैं।  इन विविध परिवर्तनों की चर्चा पूज्य गुरूजी श्री स्वामी आत्मानन्दजी ने अपने मुंडक उपनिषद् के प्रवचनों में एक दिन की।

आश्रम के सभी महात्माओं ने इस विषय को भिन्न-भिन्न भाषाओँ में प्रस्तुत किया है। पूज्य गुरूजी ने हिंदी में, पूज्य स्वामिनी अमितानंदजी ने गुजराती में, पूज्य स्वामिनी पूर्णानन्दजी ने मराठी में, एवं पूज्य स्वामिनी समतानन्दजी ने अंग्रेजी भाषा में इस महत्वपूर्ण विषय को प्रस्तुत किया है। प्रवचन ध्यान से सुनाने योग्य है।

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Talk in Gujarati – by P. Swamini Amitanandaji :

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Talk in Marathi – by P. Swamini Poornanandaji :

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Talk in English – by P. Swamini Samatanandaji :

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This entry was posted on March 14, 2018, in Ashram. Bookmark the permalink.