हनुमान चालीसा सत्संग: जून २०१८

जून २०१८ का मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २४ को वेदांत आश्रम में हुआ। पूर्ववत पहले भक्त मण्डली के द्वारा सुन्दर भजनो का आयोजन हुआ। बाद में पूज्य गुरूजी के आने के बाद हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ हुआ और तत्पश्यात पूज्य गुरूजी का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार उन्होंने २७वीं चौपाई पर प्रकाश डाला – सब पर राम तपस्वी राजा … ।

पूज्य गुरूजी ने अपने उद्बोधन में बताया की २७वीं चौपाई में गोस्वामीजी ने पहले भगवन श्री राम की महिमा बताई और फिर बतया की ऐसे प्रभु के समस्त कार्य हनुमानजी ने संपन्न करे। यह शैली एक साहित्यिक अलंकार है। अतः हमें भी इस चौपाई को समझने के लिए पहले रामजी की महिमा का स्मरण करना चाहिए। रामजी तो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं उन्होंने तो समस्त क्षेत्र में मर्यादाओं की स्थापना की है। आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श शिष्य, आदर्श पति, आदर्श  मित्र, और सबसे महत्वपूर्ण है आदर्श राजा। वे तो धर्म के मूर्तिमान स्वरुप थे। पूरी रामायण उन्ही की महिमा का बखान कर रही है। रामजी का अवतरण त्रेता युग में हुआ था लेकिन आज भी उनका राज्य आदर्श राज्य की तरह से जाना जाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जिनके कठिन प्रयास और सूझ-बुझ से देश को आज़ादी मिली वे नित्य रामजी का भजन किया करते थे, और स्वतंत्र भारत में राम राज्य की स्थापना उनका भी सपना था।

ऐसे समर्थ और ज्ञानी रामजी ने जितने भी विशेष कार्य संपन्न किये उन सभी में ज्यादातर हनुमानजी उनके चुने हुए निमित्त थे। किसी भी राजा की विशेषता मूल रूप से उसकी दूर-दृष्टी और व्यापक निति होती है, और कोई भी निति तभी सफल होती है जब उसका उचित क्रियान्वयन हो। हनुमानजी क्रियान्वयन के सबसे सूंदर अधिकारी और पात्र थे। हनुमानजी के जीवन और शब्द कोष में असंभव शब्द था ही नहीं, इसलिए रामजी का जो भी संकल्प होता था उसकी सिद्धि सुनिश्चित हो जाती थी।

कुछ लोगो के मन में यहाँ पर एक विचार आ सकता है, की हनुमानजी की ही वजह से रामजी से समस्त कार्य संभव हो पाए। लेकिन जो भी ऐसा विचार भी लता है वह हनुमानजी सो समझता ही नहीं है, और ऐसे विचार से वह हनुमानजी का आशीर्वाद नहीं प्राप्त करेगा बल्कि उनके आक्रोश का भागी बनेगा, क्योंकि हनुमानजी के दृष्टिकोण से यह पूर्णरूप से असत्य है।  जब लंका से वे लौटे तब भगवन श्री राम ने उनके स्तुति करी और पुछा की हनुमान यह तो बताओ की यह सब असंभव तो तुमने कैसे संभव कर दिया। इस पर हनुमानजी बोले की प्रभु हम जो भी करते हैं वो सब आपकी ही महिमा है, हम तो एक वानर मात्र हैं यह आपकी ही महिमा है की एक वानर को भी इतना महिमा मंडित करवा देता है। अतः रामजी की महिमा केवल ाची निति आदि बनाना नहीं है, बल्कि असमर्थ को समर्थ बना के उससे असंभव कार्य करावा देते हैं। रामजी तो त्रिलोक विजेता रावण की लंका को मात्र वानरों की सेना से जीत लेते हैं। अतः हनुमानजी की महिमा भी प्रभु राम की ही महिमा है।

इस चौपाई में एक बात और कही गयी है, और वो है रामजी ऐसे महान कैसे बने। उन्होंने एक शब्द का प्रयोग किया है और वो हैं – तपस्वी। तपस्या ही व्यक्ति तो निर्मल कर देती है वो ही व्यक्ति को महान बनाती है। भगवान का चौदह वर्ष का वनवास शायद सभी को यह ही सन्देश दे रहा है। तपस्वी व्यक्ति काम से काम चीजों में अपना जीवन सुख पूर्वक जीना सीख गया है। इसलिए वो अपने स्वार्थ की नहीं सोचता है। जो स्वार्थ से मुक्त है वो ही सबके कल्याण के बारे में सोच सकता है। पूज्य गुरूजी ने कहा की इस तपस्या के विषय पर वे अगली बार विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे।

कार्येक्रम के अंत में पूर्ववत आरती और प्रसाद वितरण हुआ।

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