हनुमान चालीसा मासिक सत्संग : सितम्बर २०१८

सितम्बर २०१८ का मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक ३० सितम्बर को वेदांत आश्रम में आयोजिय हुआ। पूर्ववत पहले भक्त मण्डली के द्वारा सुन्दर भजनो का आयोजन हुआ। बाद में पूज्य गुरूजी के आने के बाद हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ हुआ और तत्पश्यात पूज्य गुरूजी का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार भी उन्होंने २९ वी चौपाई पर प्रकाश डाला – चरों जग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा ।

पूज्य गुरूजी ने पहले पूर्व की चौपाई का सार बताया, की और मनोरथ का आशय साक्षात् भगवत प्राप्ति की इच्छा से है।  समयतः हम सब भगवन से कुछ मांगते हैं, लेकिन गोस्वामीजी कहते हैं की अगर किसी भक्त को भगण से नहीं, लेकिन भगवन को ही प्राप्त करने की इच्छा हो गयी है, तो वह एक अलग श्रेणी का भक्त हो जाता है। भगवत प्राप्ति ही मोक्ष है और उसी से अमित फल प्राप्त होता है, शेष सब मनोकामनाएं मित  फल अर्थात सिमित और नश्वर फल देती है, इसी लिए हमारा मांगने का सिलसिला अंतहीन जारी रहता है। हनुमानजी की कृपा से केवल हमारे रोगों की निवृत्ति आदि नहीं होती है, लेकिन अमित फल की प्राप्ति भी हो सकता है।  जो हमें अमित फल  है, उससे हम मित फल की ही प्रार्थना करए रहें ये कहाँ तक उचित है, यह तो हम सब को ही सूचना चाहिए।

अगली चौपाई में प्रवेश करते हुए महाराजश्री ने कहा की हनुमानजी की महिमा चरों युग में विख्यात है। वेद पुराण आदि सब से उसका गुना गान करते हैं जो आज हमारे सामने हनुमानजी की तरह प्रस्तुत है। उन्होंने बताया की जब त्रेता युग में भगवन राम अवतरित होने वाले थे तब अनेकानेक देवता गण भी भगवन की सेवा के लिए भिन्न भिन्न रूप धारण करके प्रगट हुए। उनमे पवनसुत भी थे। त्रेता में वे प्रगट हुए और चिरंजीवी होने का आशीर्वाद प्राप्त किया, फिर द्वापर में भी उनकी कथा प्राप्त होती है जग वे वन में भीम से मिले। फिर कलियुग में भी ऐसे प्रमाण उपलब्ध हैं की उन्होंने भक्तों को दर्शन दिए, उनमे तुलसीदास जी भी सम्मिलित हैं। प्रत्येक राम कथा में इसी लिए उनके लिए आज भी आसन  डाला जाता है। लेकिन जब बात सत युग की आती है तो विद्वान लोग घूम-फिर के बात बताते हैं। इसका रहस्य महत्वपूर्ण है, जो इस चौपाई के माध्यम से गोस्वामीजी सबको बताना चाहते हैं।

इसके लिए हमें पहले कुछ और प्रमाण देखने होंगे। पुरुष सूक्तम में परम पुरुष की स्तुति करते हुए वेद कहते हैं की वो परम पुरुष जो इस दुनिया में सर्वात्मा की तरह से प्रगट है  वो जितना दीखता है उससे दस गुना अधिक होता है। गीता में भगवन श्री कृष्णा कहते हैं की जो भी मुझे मात्र अभिव्यक्त रूप में देकता है वो हमारी अवमानना अथवा तिरस्कार करता है। ईश्वर का एक दृष्ट आयाम होता है और एक अदृष्ट। यह ही हम सबका भी होता है। इस समय हम सब शरीर धरी हैं।  कुछ समय बाद इस शरीर को छोड़  कर चले जायेंगे। यह जो दिख रहा है वो हम सबका भी दृष्ट आयाम है, और जिस रूप में जायेंगे वो हमारा अदृष्ट आयाम होता है। हर व्यक्ति को एक न एक दिन अपने उस अदृष्ट आयाम का जानना चाहिए, ये ही आत्म -ज्ञान का प्रयोजन होता है।  ये रहस्य हम अपने बारे में तो बाद में जान लेंगे लेकिन पहले हमें अपने इष्ट देवता के अदृष्ट आयाम के अस्तित्व को जानना अथवा काम-सेकम उसके अस्तित्व की श्रद्धा रखनी चाहिए। ये ही बात यहाँ इस मासूम से चौपाई में कही जा रही है। हनुमानजी का दृष्ट रूप तो त्रेता में ही सबसे पहले दिखा था, लेकिन उससे पूर्व वे अपने अदृष्ट रूप में विद्यमान थे। अतः सात-युग में भी हनुमानजी थे लेकिन अपने अदृष्ट रूप में। यह अदृष्ट रूप हमारे भगवन का वास्तवविक रूप होता है, क्यूंकि यह की अविनाशी होता है, दृष्ट रूप तो सभी का विनाशी होता है।  अतः हम सब जब हनुमानजी की पूजा-उपासना करें तो सबसे पहले उनके दिव्या दृष्ट रूप देखें और फिर नियम-पूर्वक उनके अदृष्ट पेहलु के बारे में भी विश्वास दृढ़ करें। इसके लिए श्रुति और युक्ति दोनों प्रमाण उपलब्ध है। वह अदृष्ट रूप क्या है, उसका भी इसी चौपाई में लक्षण प्रदान करते हैं। यह वो पहलु है जिससे जगत में उजियारा होता है। वो सबका प्रकाशक – चेतन सत्ता है। पूज्य गुरूजी ने कहा की इस का हम सब अगले सत्र में चिंतन करेंगे।

कार्यक्रम के अंत में हनुमानजी की आरती हुई और सबने प्रसाद ग्रहण किया।

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