हनुमान चालीसा मासिक सत्संग : अक्टूबर २०१८

अक्टूबर २०१८ का मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २८ अक्टूबर को वेदांत आश्रम में आयोजिय हुआ। पूर्ववत पहले भक्त मण्डली के द्वारा सुन्दर भजनो का आयोजन हुआ। बाद में पूज्य गुरूजी के आने के बाद हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ हुआ और तत्पश्यात पूज्य गुरूजी का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार भी उन्होंने पहले २९ वी चौपाई का सार बताया, और फिर ३०वीं चौपाई में प्रवेश किया – साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।।

पूज्य गुरूजी ने पहले पूर्व की चौपाई का सार बताया, की। … चारों जुग परताप तुम्हारा। सभी जानते हैं की हनुमानजी का प्राकट्य त्रेता युग में भगवन श्री राम के अवतरण के समय हुआ था, द्वापर और कलियुग की भी उनकी कथाएं उपलब्ध हैं, लेकिन सत युग में भी उनका परताप था ये कैसे जाने ? इसके बारे में शास्त्र हम सबके बारे में बताते हैं की भले भगवन हो या जीव – सबके दो पहलु होते हैं – स्थूल और सूक्ष्म। स्थूल इन्द्रिय ग्राह्य होता है, वो ही आता और जाता है, लेकिन सूक्ष्म बना रहता है। देवलोक में देवता गण अपने इसी सूक्ष्म रूप में पहले भी थे। तो हनुमानजी का भी हर भक्त को सूक्ष्म अस्तित्व का ज्ञान होना चाहिए। आज हममरे पूर्वज स्थूल रूप में हमारे साथ नहीं हैं फिर भी हम सब उन्हें तर्पण आदि देते हैं क्यूंकि वे भी अपने सूक्ष्म रूप से आज भी विद्यमान है। अपने सूक्ष्म शरीर के बारे में सोचने से पहले अपने भगवान् के सूक्ष्म अस्तित्व का अवश्य ज्ञान होना चाहिए। हनुमानजी सतयुग में अपने सूक्ष्म रूप में विद्यमान थे। इस तरह से इस सामान्य चौपाई में भी एक गंभीर ज्ञान छुपा हुआ है।

इसके बाद महाराज श्री ने ३० वी चौपाई में प्रवेश किया। उन्होंने बताया की ये चौपाई सभी साधु सन्यासी के जीवन का आधार है। भगवान् ही एकाकी लोगों के रक्षक और पालनकर्ता हैं। तत्त्व ज्ञान के लिए अपने मन को सभी आश्रयों से मुक्त करना आयश्यक होता है। जब कोई धन, दौलत और सभी सांसारिक संबंधों से अलग हो जाता है तो एक आम इंसान सोचता है की फिर ऐसे लोगों का जीवन कैसे चलेगा – सभी साधु लोगों की देखभाल ईश्वर और ईश्वर के ऐसे परम भक्त ही करते हैं। गीता में भी भगवन श्री कृष्ण कहते हैं की हो भी अनन्य हो कर हमको भजता है हम उसके योग और क्षेम की पूरी देखभाल करते हैं। यह मन को अत्यंत द्रवित करने का अनुभव होता है की हम यह साक्षात् अनुभव करें की कोई दिव्य सत्ता हमारी देखभाल कर रही है। गोस्वामी तुलसीदास जी भी स्पष्ट रूप से अपने जीवन का यह अनुभव बता रहे हैं की – आप ही सभी साधु लोगों के रखवाले हैं। जब तक हम सब दुनिया भर की चीजों पर आश्रित रहते हैं तब तक हमें यह नहीं अनुभव हो पायेगा की ईश्वर हमारी देखभाल करते हैं। बल्कि ऐसे लोगों को एक प्रकार का अभिमान हो जाता है की हम इतने समर्थ है इत्यादि। अनाश्रित हो को अनुभव हो सकता है की भगवान् ही हमारे राख्षक और स्वामी हैं। एक बार यह निश्चय हो जाये फिर तो हम सब एक मुक्ति का अनुभव करेंगें, हमारे सम्बद्ध निःस्वार्थ  हो जायेंगे, हम सबकी संवेदनशीलता बढ़ जाएगी – और यह ही स्वस्थ और प्रबुद्ध होक जीने का मतलब होता है।

कार्यक्रम के अंत में हनुमानजी की आरती हुई और सबने प्रसाद ग्रहण किया।

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