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हनुमान चालीसा सत्संग: अप्रैल २०१८

अप्रैल २०१८ का हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २९ अप्रैल को वेदांत आश्रम में आयोजित हुआ। पूर्ववत पहले सुन्दर भजनों  की प्रस्तुति हुई और फिर पूज्य गुरूजी के व्यास पीठ पर पधारने के बाद सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ हुआ। तदोपरांत प्रवचन का प्रारम्भ हुआ। उसमे पहले २५वीं चौपाई पर चर्चा हुई और फिर २६वीं चौपाई में प्रवेश हुआ।

 

२५वीं चौपाई पर चर्चा करते हुए पूज्य गुरूजी ने बताया की रोग स्थूल शरीर में होते हैं और पीड़ा मन में होती है, रोग भी दर्द देता है, लेकिन आसक्त और अज्ञानी मन पीड़ा को कई गुना बढ़ा देता है। कई बार तो मन अनेकानेक समस्यों की उपेक्षा करके व्यथा से मुक्त भी रह सकता है। अतः अगर मन विवेकी होता है तो हमारे विविध रोग और तद्जनित पीड़ाएँ नष्ट-प्रायः हो जाती हैं। इस अत्यंत कल्याणकारी सिद्धि के लिए यहाँ गोस्वामीजी कहते हैं की व्यक्ति में निरंतर जप का सामर्थ्य होना चाहिए। शरीर और मन के विकारों से मुक्त रहने का सामर्थ्य की प्राप्ति में जप का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। जप में हम अपने मन को धन्यता से ईश्वर के चरणों में लगाना सीखते हैं। जब मन हमारी इच्छा से कहीं और लग सकता है तो स्वाभाविक है की बाकि किसी चीज की संवेदना नहीं रहती है। कोई भी अनुभूति हम लोगों की मानसिक संवेदना पर ही आश्रित होती हैं। अतः अपनी प्रेरणा के आस्पद के चरणों में मन लगा पाने की सिद्धि हमें विकारों से अप्रभावित कर देती है। यह हमारे इष्ट की ही कृपा से होता है।

जप के बारे में पूज्य गुरूजी ने आगे बताया की जप जो की ईश्वर की एक विभूति है, उसके तीन सोपान हैं – उच्च जप, मंद जप, और चित्तजम जप, और इसका पर्यवसान ध्यान की सिद्धि में होता है। इन तीनो के बारे में संक्षेप में बताया गया, और सभी को नित्य ईश्वर के नाम का जप करने की प्रेरणा दी गयी, तथा निरंतर जप का भी आशय बताया गया। निरंतर जप का आशय सतत ईश्वर की सन्निधि का अनुभव होता है – जो की परिस्थिति निरपेक्ष हो। अर्थात सुख हो अथवा दुःख, ईश्वर के अस्तित्व और माहत्म्य का सतत अनुभव और स्मरण होता है। विवेकी व्यक्ति रोग आदि का बाहरी उपचार तो करता ही है, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण मन का सामर्थ्य होता है। यह ही इस सुन्दर चौपाई का रहस्य है।

२६वीं चौपाई में प्रवेश करते हुए उन्होंने बताया की गोस्वामिजी कहते हैं की जप की सिद्धि का पर्यवसान ध्यान के सामर्थ्य की प्राप्ति होती है, और जब यह सामर्थ्य प्राप्त होने लगता है तब तो हनुमानजी की कृपा से कोई संकट रहते ही नहीं हैं। ध्यान की महिमा को आज विश्व ने जाना है, इसीलिए इसकी इतनी प्रसिद्धि हो गयी है। ध्यान में किसी वस्तु में हमारा मन तल्लीन हो जाता है। मन न रहे दस-बीस अतः एक मन कहीं लीं हो जाता है तो कोई संकट नहीं रहता है। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि भी विकसित होने लगती है, अतः किसी भी समस्याओं का प्रामाणिक उपचार का शोध होता है और असंगता भी। पूज्य गुरूजी ने कहा की इस विषय को अगले सत्र में आगे चर्चा के लिए लेंगे।

अंत में आरती और प्रसाद वितरण हुआ।

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फोटो एल्बम 

प्रवचन 

Sankaracharya Jayanti Celebrations

On 20th April 2018 was the Jayanti of Bhagwan Sri Aadi Sankaracharya – Jyestha Shukla Panchami. The great Acharya was born in Kalady village of Kerala in 509 BC (and not 788 AD) which makes it 2527 years earlier. He literally started the rennaisance of Sanatan Dharma, presented the subtle tenets of Sanatan Dharma very logically, rejuvenated the religious traditions & systems etc. He is no wonder very venerated Mahatma.

At Vedanta Ashram we have a statue of Bhagwan Sankaracharya in our Satsang Hall, and also a Sankaracharya Gate in the E-Sector of Sudama Nagar with his statue. A special program was organized in the evening. After paying obesainces at the feet of the great Acharya in the Ashram, Poojya Guruji along with Ashram Mahatmas and devotees went in a procession to the Sankaracharya Dwar. Using a ladder one of the devotees Sh Vinod Puri of Dashnam Goswami Samaj, went upto the statue and cleaned it, did abhishek, and appropriately decorated it. Later Aarti was done and prasad distributed.

Later after coming back to Ashram, Poojya Guruji gave a short overview of the life of Aadi Sankara. Later poha & tea was organized for all.

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‘Birds of Indore’- Presentation

On 14th April 2018, Saturday evening, an Audio-Visual Presentation on the topic of BIRDS OF INDORE by Padma Shri Bhalu Mondheji was organized at Vedanta Ashram. Bhaluji is a well acclaimed Conservationist and Nature-Lover, who along with his NGO, the Natures Volunteers, has done pioneering work to restore & rejuvenate the Sirpur Lake of Indore.  Today Sirpur Lake has been designated as an IBA – Important Bird Area, by the BNHS. The area has around 300+ species of birds including the state bird of MP, namely, the beautiful Asian Paradise Flycatcher.

The presentation was organized in the second floor Dining Hall, and the enthusiasm was such that it was shortly fully packed. Projector and Screen were timely organized, and the program started around 8.00 PM and lasted for 90 minutes. It was a great eye-opener for many, who have been living in the city but were not aware of its avian heritage. In the end there were some Q&A too. In the end Baisakhi Dinner was organized for all – courtesy Sh Vinod Arora & family.

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This entry was posted on April 15, 2018, in Ashram.

मंदिरों का आध्यात्मिक विकास में योगदान

आध्यात्मिक विकास मूल रूप से मात्र ज्ञान से सम्भव होता है, लेकिन तत्त्व ज्ञान के किये एक सात्त्विक, सूक्ष्म और संवेदनशील मन की आवश्यकता होती है। यह ही विविध साधनाओं का प्रयोजन होता है। ईश्वर शब्द का वाच्यार्थ अर्थ देखने से आवश्यक गुण प्राप्त हो जाते हैं। जो वाच्यार्थ को नहीं देख सकता उस के लिए लक्ष्यार्थ देखना तो कल्पना मात्र है। सनातन धर्म में ईश्वर शब्द का प्रारम्भ में वाच्यार्थ देखने की बहुत महिमा होती है। हम लोगों के अनेकानेक मंदिरों का यह ही प्रयोजन होता है। जब कोई श्रद्धालु मंदिर जाता है तो ईश्वर का विग्रह देख के मन में अनेकों परिवर्तनों की संभावना होती है – जो की हम लोगों के आध्यात्मिक विकास में महत्व पूर्ण योगदान देते हैं।  इन विविध परिवर्तनों की चर्चा पूज्य गुरूजी श्री स्वामी आत्मानन्दजी ने अपने मुंडक उपनिषद् के प्रवचनों में एक दिन की।

आश्रम के सभी महात्माओं ने इस विषय को भिन्न-भिन्न भाषाओँ में प्रस्तुत किया है। पूज्य गुरूजी ने हिंदी में, पूज्य स्वामिनी अमितानंदजी ने गुजराती में, पूज्य स्वामिनी पूर्णानन्दजी ने मराठी में, एवं पूज्य स्वामिनी समतानन्दजी ने अंग्रेजी भाषा में इस महत्वपूर्ण विषय को प्रस्तुत किया है। प्रवचन ध्यान से सुनाने योग्य है।

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Talk in Gujarati – by P. Swamini Amitanandaji :

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Talk in Marathi – by P. Swamini Poornanandaji :

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Talk in English – by P. Swamini Samatanandaji :

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This entry was posted on March 14, 2018, in Ashram.

हनुमान चालीसा सत्संग – फरवरी २०१८

वेदांत आश्रम में दिनांक  18/२ को फरवरी  मॉस के मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन हुआ। प्रारम्भ में पूर्ववत भजनो का कार्यक्रम हुआ, और फिर हनुमान चालीसा के पाठ  के बाद पूज्य गुरूजी श्री स्वामी आत्मानंदजी महाराज का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार २४वीं  चौपाई पर प्रवचन हुआ – भूत पिशाच निकट नहीं आवे। महावीर जब नाम सुनावे।।  प्रारम्भ में गाया हुआ एक सुन्दर भजन :

 

उन्होंने बताया की भूत और पिशाच तामसी योनियां होती हैं, जो की मूल रूप से काम और क्रोध के अतिरेक की अग्रिम रूप और अभिव्यक्ति होती हैं। हमारे मन में जो भी विकार होते हैं वे जब प्रबल हो जाते हैं तब वे बाहर भी अभिव्यक्त हो कर दिखने लगते हैं। ईश्वर की भक्ति से युक्त होकर उनका अपने आखों से दर्शन भी इसी सिद्धांत के अनुरूप होता है। दुनियां में होती तो बहुत सारी चीजें हैं लेकिन दिखते वो ही है जिसका हमारे मन में महत्त्व होता है। जो भूतकाल की अतृप्त कामनाओं से व्यथित होते हैं उन्हें उनका भूतकाल अपनी चिंताओं और डर से युक्त होकर भूत के रूप में प्रगट होकर डराता रहता है। और जो अपनी अपूर्त आकांक्षाओं के कारण किसी न किसी बाह्य हेतु को उसका जिम्मेदार समझते हैं वे क्रोध की आग में जलते हैं और यह ही अपने अग्रिम रूप में पिशाच बनकर उन्हें डराता रहता है। ऐसे लोगों की दृष्टि से भूत पिशाच निश्चित रूप से होते हैं और उन्हें न केवल दिखते हैं बल्कि उन्हें डराते भी हैं। इन सब सिद्धांत का प्रमाण यह है की ये ही भूत आदि दूसरों को दिखते भी नहीं हैं। वेदांत का सिद्धांत है की हमारी दृष्टि ही सृष्टि उत्पन्न करती है, अतः जिन लोगों  को दिखते हैं वे सब उनके लिए निश्चित रूप से सत्य होते हैं, और उनका उचित उपचार करना आवश्यक होता है।

नकारात्मक सोच के शारीरिक अथवा मानसिक दुष्परिणाम किसी औषधियों से नहीं बल्कि सकारात्मक सोच से ही स्थायी रूप से दूर करे जा सकते हैं।  अतः गोस्वामीजी कहते हैं की जो-जो लोग ऐसे दुष्परिणामों के शिकार हैं उनके लिए हनुमानजी का नाम ही पर्याप्त है। अच्छाई के अस्तित्व की आस्था बुराई की निवृत्ति का पहला कदम होती है। अतः हनुमानजी के नाम मात्र का उच्चारण इन भूत और पिशाचों को दूर भगा देता है। हनुमानजी जैसे भक्तों के चरित्र का चिंतन आगे चल के हमें काम-क्रोध आदि विकारों से ही मुक्त करके भक्ति का प्रसाद प्रदान कर देता है। यह ही बात इस चौपाई में बताई गई है।

कार्यक्रम का समापन आरती और प्रसाद से हुआ।

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प्रवचन

फोटो एल्बम 

Camp Conclusion

On 13th Feb, the Mahashivratri Vedanta Camp concluded very satisfactorily. The campers gave out their experiences of the camp. It was great to see that everyone go from here fully satisfied and happy.

This entry was posted on February 13, 2018, in Ashram, Camp.

Karaoke by Campers

On 11th Feb night, in place of the after dinner bhajans, there was a Karaoke Session. Most of the participants opened up and gave presentation. It was fun seeing everyone relaxed and at home. There were some very lovely presentations.

This entry was posted on February 12, 2018, in Ashram, Camp.

Trip to Sirpur

On 11th Feb afternoon, the campers were taken to Sirpur Lake for an outing and a picnic lunch.

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This entry was posted on February 12, 2018, in Ashram.

Vedanta Camp Starts

The Mahashivratri Vedanta Camp at Vedanta Ashram started on 8th Feb 2018, with campers from Mumbai, Lucknow, Bhavnagar and Ahmedabad. The subject matter of the main discourse by Poojya Guruji Swami Atmanandaji is Kaivalyopanishad. P. Swamini Amitanandaji is conducting discourses on Shiv-Sankalpa Sukta, while P. Swamini Samatanandaji is taking sessions on Meditation and also Chanting. P. Swamini Poornanandaji is directing devotees in the daily Shiv-Puja.

Apart from these sessions there is a session of Discussion in which the campers put forward their views on some topic presented to them. In the night there is a lovely session of bhajans, before we call off the day.

This entry was posted on February 9, 2018, in Ashram, Camp.

हनुमान चालीसा सत्संग : जनवरी २०१८

जनवरी २०१८ माह का मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २१ जनवरी को था। कार्यक्रम का शुभारम्भ सूंदर भजनों  से हुआ और फिर सबने हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ  किया। तदुपरांत पूज्य गुरूजी स्वामी आत्मानंद जी ने अपना प्रवचन चालीसा की २३ वी चौपाई (आपन तेज सम्हारो आपै। ..) पर ही आगे बढ़ाया।

अपने प्रवचन में पूज्य गुरूजी ने बताया की हनुमानजी का तेजस अतुल्य है, गोस्वामीजी कहते हैं की केवल वे ही इसे धारण कर सकते हैं। इतना तेजस धारण करने की क्षमता एक सामान्य मनुष्य अथवा योनि में नहीं दिखती है। उन्होंने इसकी तुलना भगवान शंकर से की जब उन्होंने गंगाजी को धारण किया था। जैसे गंगाजी को धारण करने वाला और कोई नहीं है, उसी तरह हनुमानजी का तेजस है। गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं की वे ही तेजस्वीओं का तेज हैं अतः तेज ईश्वर  की ही आभा है। हनुमानजी का अंत्यंत महान तेज उनके सबसे महँ ज्ञान से युक्त होने का प्रमाण है – वे रामजी के तत्त्व के ज्ञाता है। वे ब्रह्म ज्ञानी हैं। इसी लिए इतने तेजस्वी हैं।

आगे गोस्वामीजी कहते हैं की – तीनों लोक हांक ते कापै, जब हनुमानजी लंका से वापस जा रहे थे तब उन्होंने बड़ी जोर से चिक्खार करि, आवाज़ की, गर्जना करी – उसे सुन कर लंकावासिओं की हृदयगति थमने सी लगी, गर्भिणियों के गर्भ गिरने लगे। ये सब एक अत्यंत बलवान और उत्साही व्यक्ति का सूचक है।

भगवद गीता का हवाला देते हुए पूज्य स्वामीजी ने कहा की जब अर्जुन को भगवन ने स्थित प्रज्ञ के बारे में बताया तो उसने अपनी और जिज्ञासा प्रगट करते हुए पूछा की स्थित प्रज्ञ के बारे में कृपया और बताएं – की उसके लक्षण क्या होते हैं, वह अपने साथ होता है तो कैसा होता है, और जब दुनिया की विविध परस्थितियों में वो अभिव्यक्तियाँ करता है तो वो कैसी होती हैं आदि, इसी तरह से यहाँ पर गोस्वामीजी हनुमानजी जैसे अदभुत ज्ञानी के बारे में पूछता है की वे जब अपने साथ होते हैं तो कैसे होते हैं और जब विविध परस्थितियों में अभिव्यक्तियां करते हैं तो वो कैसे होती हैं – इसी का उत्तर दे रहे हैं. की सामान्य रूप से वे तेज के पुंज हैं। और जब विविध परिस्थियों में अभिव्यक्त होते हैं तो वह अंत्यंत समग्र होती है।  यह ही दिव्य तेज और भयंकर हांक शब्दों से कह रहे हैं।

इस कार्यक्रम में पूज्य गुरूजी के एक पुराने शिष्य स्वामी माधवानंद जी, जो के चिन्मय मिशन रांची में कार्यरत हैं गुरूजी के दर्शन हेतु आये थे। उन्होंने भी अंत में आभार के दो शब्द कहे। कार्यक्रम सा समापन आरती से हुआ।

 

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