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हनुमान चालीसा सत्संग: अप्रैल २०१८

अप्रैल २०१८ का हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २९ अप्रैल को वेदांत आश्रम में आयोजित हुआ। पूर्ववत पहले सुन्दर भजनों  की प्रस्तुति हुई और फिर पूज्य गुरूजी के व्यास पीठ पर पधारने के बाद सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ हुआ। तदोपरांत प्रवचन का प्रारम्भ हुआ। उसमे पहले २५वीं चौपाई पर चर्चा हुई और फिर २६वीं चौपाई में प्रवेश हुआ।

 

२५वीं चौपाई पर चर्चा करते हुए पूज्य गुरूजी ने बताया की रोग स्थूल शरीर में होते हैं और पीड़ा मन में होती है, रोग भी दर्द देता है, लेकिन आसक्त और अज्ञानी मन पीड़ा को कई गुना बढ़ा देता है। कई बार तो मन अनेकानेक समस्यों की उपेक्षा करके व्यथा से मुक्त भी रह सकता है। अतः अगर मन विवेकी होता है तो हमारे विविध रोग और तद्जनित पीड़ाएँ नष्ट-प्रायः हो जाती हैं। इस अत्यंत कल्याणकारी सिद्धि के लिए यहाँ गोस्वामीजी कहते हैं की व्यक्ति में निरंतर जप का सामर्थ्य होना चाहिए। शरीर और मन के विकारों से मुक्त रहने का सामर्थ्य की प्राप्ति में जप का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। जप में हम अपने मन को धन्यता से ईश्वर के चरणों में लगाना सीखते हैं। जब मन हमारी इच्छा से कहीं और लग सकता है तो स्वाभाविक है की बाकि किसी चीज की संवेदना नहीं रहती है। कोई भी अनुभूति हम लोगों की मानसिक संवेदना पर ही आश्रित होती हैं। अतः अपनी प्रेरणा के आस्पद के चरणों में मन लगा पाने की सिद्धि हमें विकारों से अप्रभावित कर देती है। यह हमारे इष्ट की ही कृपा से होता है।

जप के बारे में पूज्य गुरूजी ने आगे बताया की जप जो की ईश्वर की एक विभूति है, उसके तीन सोपान हैं – उच्च जप, मंद जप, और चित्तजम जप, और इसका पर्यवसान ध्यान की सिद्धि में होता है। इन तीनो के बारे में संक्षेप में बताया गया, और सभी को नित्य ईश्वर के नाम का जप करने की प्रेरणा दी गयी, तथा निरंतर जप का भी आशय बताया गया। निरंतर जप का आशय सतत ईश्वर की सन्निधि का अनुभव होता है – जो की परिस्थिति निरपेक्ष हो। अर्थात सुख हो अथवा दुःख, ईश्वर के अस्तित्व और माहत्म्य का सतत अनुभव और स्मरण होता है। विवेकी व्यक्ति रोग आदि का बाहरी उपचार तो करता ही है, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण मन का सामर्थ्य होता है। यह ही इस सुन्दर चौपाई का रहस्य है।

२६वीं चौपाई में प्रवेश करते हुए उन्होंने बताया की गोस्वामिजी कहते हैं की जप की सिद्धि का पर्यवसान ध्यान के सामर्थ्य की प्राप्ति होती है, और जब यह सामर्थ्य प्राप्त होने लगता है तब तो हनुमानजी की कृपा से कोई संकट रहते ही नहीं हैं। ध्यान की महिमा को आज विश्व ने जाना है, इसीलिए इसकी इतनी प्रसिद्धि हो गयी है। ध्यान में किसी वस्तु में हमारा मन तल्लीन हो जाता है। मन न रहे दस-बीस अतः एक मन कहीं लीं हो जाता है तो कोई संकट नहीं रहता है। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि भी विकसित होने लगती है, अतः किसी भी समस्याओं का प्रामाणिक उपचार का शोध होता है और असंगता भी। पूज्य गुरूजी ने कहा की इस विषय को अगले सत्र में आगे चर्चा के लिए लेंगे।

अंत में आरती और प्रसाद वितरण हुआ।

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प्रवचन 

हनुमान चालीसा सत्संग: मार्च २०१८

वेदांत आश्रम में दिनांक  25/3 को मार्च मॉस के मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन हुआ। प्रारम्भ में पूर्ववत भजनो का कार्यक्रम हुआ, और फिर हनुमान चालीसा के पाठ  के बाद पूज्य गुरूजी श्री स्वामी आत्मानंदजी महाराज का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार भी कुछ समय २४वीं  चौपाई पर चर्चा करने के बाद २५वे चौपाई (नाशै  रोग हरै  सब पीरा।  जपत निरंतर हनुमत बीरा।।) में प्रवेश हुआ।

पूज्य गुरूजी ने बताया की भूत और पिशाच काम और क्रोध के अतिरेक की अभिव्यक्तियाँ होते हैं। वैसे भी जब किसी को काम और क्रोध का आवेश आता है – तो भी वह भूत की ही तरह उसके ऊपर चढ़ कर उन्हें अपने वश में कर अकल्पनीय काम करवा देता है, जब मनुष्य अपने वश में नहीं रह पता है, लेकिन अत्यंत जोश में कार्य भी करता है – तभी कहा जाता है की उसके ऊपर कोई भूत सा चढ़ गया है।  पिशाच क्रोध के अतिरेक की बाह्य अभिव्यक्ति होती है – ऐसे लोग हिंसक भी हो सकते हैं। जहाँ भूत मनुष्य को बेबस करके कुछ कार्य करवाता है, वहीँ, पिशाच मनुष्य को संवेदनाविहीन करके हिंसक भी कर देता है। ऐसे लोगों को देखा जाये तो एक बात स्पष्ट दिखती है की ये लोग मूल रूप से स्वार्थ से ही प्रेरित होते हैं। दूसरी तरफ भक्ति तो अपने आराध्य के प्रति शरणागति है। भक्त तो यह देखता है की जो भी चल रहा है वो सब ईश्वर की ही कृपा से चल रहा है, और इस तरह वो अपने स्वार्थ प्रेरित आकांक्षाओं से मुक्त रहता है। सात्त्विक मन में काम और क्रोध आदि विकारों के अस्तित्व नहीं होता है, अतः भूत-प्रेत आदि का चढ़ना उनके जीवन में नहीं होता है। बल्कि अगर किसी के ऊपर ऐसी कुछ छाया भी हो तो धन्यता की प्रतिमूर्ति हनुमानजी के स्मरण मात्र से दूर हो जाती है।

पूज्य गुरूजी ने बताया की यद्यपि यह चौपाई भूत-पिशाच से निवृत्ति के उपाय बताने के कारण अत्यंत प्रसिद्ध है, क्यूंकि अज्ञानी लोगों को अनेकानेक चीज़ों का डर  लगा रहता है, लेकिन इस चौपाई की विवक्षा मूल रूप कुछ और है। मूल विवक्षा तो महावीर के नाम उच्चारण की महिमा है।

कार्यक्रम का समापन आरती और प्रसाद से हुआ।

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हनुमान चालीसा सत्संग – फरवरी २०१८

वेदांत आश्रम में दिनांक  18/२ को फरवरी  मॉस के मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन हुआ। प्रारम्भ में पूर्ववत भजनो का कार्यक्रम हुआ, और फिर हनुमान चालीसा के पाठ  के बाद पूज्य गुरूजी श्री स्वामी आत्मानंदजी महाराज का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार २४वीं  चौपाई पर प्रवचन हुआ – भूत पिशाच निकट नहीं आवे। महावीर जब नाम सुनावे।।  प्रारम्भ में गाया हुआ एक सुन्दर भजन :

 

उन्होंने बताया की भूत और पिशाच तामसी योनियां होती हैं, जो की मूल रूप से काम और क्रोध के अतिरेक की अग्रिम रूप और अभिव्यक्ति होती हैं। हमारे मन में जो भी विकार होते हैं वे जब प्रबल हो जाते हैं तब वे बाहर भी अभिव्यक्त हो कर दिखने लगते हैं। ईश्वर की भक्ति से युक्त होकर उनका अपने आखों से दर्शन भी इसी सिद्धांत के अनुरूप होता है। दुनियां में होती तो बहुत सारी चीजें हैं लेकिन दिखते वो ही है जिसका हमारे मन में महत्त्व होता है। जो भूतकाल की अतृप्त कामनाओं से व्यथित होते हैं उन्हें उनका भूतकाल अपनी चिंताओं और डर से युक्त होकर भूत के रूप में प्रगट होकर डराता रहता है। और जो अपनी अपूर्त आकांक्षाओं के कारण किसी न किसी बाह्य हेतु को उसका जिम्मेदार समझते हैं वे क्रोध की आग में जलते हैं और यह ही अपने अग्रिम रूप में पिशाच बनकर उन्हें डराता रहता है। ऐसे लोगों की दृष्टि से भूत पिशाच निश्चित रूप से होते हैं और उन्हें न केवल दिखते हैं बल्कि उन्हें डराते भी हैं। इन सब सिद्धांत का प्रमाण यह है की ये ही भूत आदि दूसरों को दिखते भी नहीं हैं। वेदांत का सिद्धांत है की हमारी दृष्टि ही सृष्टि उत्पन्न करती है, अतः जिन लोगों  को दिखते हैं वे सब उनके लिए निश्चित रूप से सत्य होते हैं, और उनका उचित उपचार करना आवश्यक होता है।

नकारात्मक सोच के शारीरिक अथवा मानसिक दुष्परिणाम किसी औषधियों से नहीं बल्कि सकारात्मक सोच से ही स्थायी रूप से दूर करे जा सकते हैं।  अतः गोस्वामीजी कहते हैं की जो-जो लोग ऐसे दुष्परिणामों के शिकार हैं उनके लिए हनुमानजी का नाम ही पर्याप्त है। अच्छाई के अस्तित्व की आस्था बुराई की निवृत्ति का पहला कदम होती है। अतः हनुमानजी के नाम मात्र का उच्चारण इन भूत और पिशाचों को दूर भगा देता है। हनुमानजी जैसे भक्तों के चरित्र का चिंतन आगे चल के हमें काम-क्रोध आदि विकारों से ही मुक्त करके भक्ति का प्रसाद प्रदान कर देता है। यह ही बात इस चौपाई में बताई गई है।

कार्यक्रम का समापन आरती और प्रसाद से हुआ।

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हनुमान चालीसा सत्संग : जनवरी २०१८

जनवरी २०१८ माह का मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २१ जनवरी को था। कार्यक्रम का शुभारम्भ सूंदर भजनों  से हुआ और फिर सबने हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ  किया। तदुपरांत पूज्य गुरूजी स्वामी आत्मानंद जी ने अपना प्रवचन चालीसा की २३ वी चौपाई (आपन तेज सम्हारो आपै। ..) पर ही आगे बढ़ाया।

अपने प्रवचन में पूज्य गुरूजी ने बताया की हनुमानजी का तेजस अतुल्य है, गोस्वामीजी कहते हैं की केवल वे ही इसे धारण कर सकते हैं। इतना तेजस धारण करने की क्षमता एक सामान्य मनुष्य अथवा योनि में नहीं दिखती है। उन्होंने इसकी तुलना भगवान शंकर से की जब उन्होंने गंगाजी को धारण किया था। जैसे गंगाजी को धारण करने वाला और कोई नहीं है, उसी तरह हनुमानजी का तेजस है। गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं की वे ही तेजस्वीओं का तेज हैं अतः तेज ईश्वर  की ही आभा है। हनुमानजी का अंत्यंत महान तेज उनके सबसे महँ ज्ञान से युक्त होने का प्रमाण है – वे रामजी के तत्त्व के ज्ञाता है। वे ब्रह्म ज्ञानी हैं। इसी लिए इतने तेजस्वी हैं।

आगे गोस्वामीजी कहते हैं की – तीनों लोक हांक ते कापै, जब हनुमानजी लंका से वापस जा रहे थे तब उन्होंने बड़ी जोर से चिक्खार करि, आवाज़ की, गर्जना करी – उसे सुन कर लंकावासिओं की हृदयगति थमने सी लगी, गर्भिणियों के गर्भ गिरने लगे। ये सब एक अत्यंत बलवान और उत्साही व्यक्ति का सूचक है।

भगवद गीता का हवाला देते हुए पूज्य स्वामीजी ने कहा की जब अर्जुन को भगवन ने स्थित प्रज्ञ के बारे में बताया तो उसने अपनी और जिज्ञासा प्रगट करते हुए पूछा की स्थित प्रज्ञ के बारे में कृपया और बताएं – की उसके लक्षण क्या होते हैं, वह अपने साथ होता है तो कैसा होता है, और जब दुनिया की विविध परस्थितियों में वो अभिव्यक्तियाँ करता है तो वो कैसी होती हैं आदि, इसी तरह से यहाँ पर गोस्वामीजी हनुमानजी जैसे अदभुत ज्ञानी के बारे में पूछता है की वे जब अपने साथ होते हैं तो कैसे होते हैं और जब विविध परस्थितियों में अभिव्यक्तियां करते हैं तो वो कैसे होती हैं – इसी का उत्तर दे रहे हैं. की सामान्य रूप से वे तेज के पुंज हैं। और जब विविध परिस्थियों में अभिव्यक्त होते हैं तो वह अंत्यंत समग्र होती है।  यह ही दिव्य तेज और भयंकर हांक शब्दों से कह रहे हैं।

इस कार्यक्रम में पूज्य गुरूजी के एक पुराने शिष्य स्वामी माधवानंद जी, जो के चिन्मय मिशन रांची में कार्यरत हैं गुरूजी के दर्शन हेतु आये थे। उन्होंने भी अंत में आभार के दो शब्द कहे। कार्यक्रम सा समापन आरती से हुआ।

 

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Hanuman Chalisa Satsang: Dec 2017

दिसम्बर २०१७ का अंतिम हनुमान चालीसा सत्संग साल के अंतिम दिन और अंतिम रविवार दिनांक ३१ को वेदांत आश्रम में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का प्रारम्भ सुन्दर भजनो से हुआ। सुनील कुमार ओझा और गुलाब चाँद व्यास जी ने पूज्य गुरूजी स्वामी आत्मानंद जी का स्वागत पुष्प माला से किया। सबने सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ  किया, और फिर राम-नाम संकीर्तन के बाद प्रवचन का शुभारम्भ हुआ। इस बार चालीसा की २३वीं  चौपाई पर चिंतन हुआ – आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों  लोक हाँक ते कापै ।।

अपने प्रवचन में पूज्य गुरूजी ने बताया की हनुमानजी अत्यंत तेजस्वी हैं, और कोई भी ऐसा नहीं हैं जो उनके तेज का पराभव कर सके। पराभव तो दूर की बात है कोई उनका सामना भी नहीं कर सकता है। व्यक्तित्व का तेज अनेकों प्रकार से अभिव्यक्त होता है – चेहरे की दिव्य चमक, शरीर में उत्साह, विचारों में उमंग और सूक्ष्म विचार, और मन में निर्भीकता और अन्य दैवी गुण । तेज से युक्त व्यक्ति में कोई चिंता, भय और तनाव आदि का तो नामोनिशान नहीं दिखता है। आज के समय में जब तनाव का चारों तरफ बोलबाला और साम्राज्य है लोग मानों तेज विहीन से हो गए हैं। अच्छी शिक्षा और संस्कार व्यक्ति को सुन्दर और तेजस्वी व्यक्तित्व का धनी बना देते हैं। वो ही ज्ञान सुन्दर और कल्याणकारी है जो हमें सुन्दर और तेजस्वी व्यक्तित्त्व से युक्त करे। ऐसे व्यक्ति के लिए समस्याएं भी मात्र परिस्थिति बन जाती हैं, और जो इनसे विहीन होते हैं उनके लिए है एक परिस्थिति भी समस्या बन जाती है। एक निर्मलानंद जी महाराज जी ने कहा है – पहले हम कतरे को भी दरिया समझ कर डूब जाते थे , लेकिन निर्मल अब तो हम दरिया को भी कतरा समझते हैं। यह ही हनुमान जी के व्यक्तित्व का लक्षण था। उन्होंने दरिया को कतरे की तरह ही देखा और आसानी से कूद गए। और आगे भी क्या क्या किया यह सामान्य व्यक्तियों के लिए अकल्पनीय था।

गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं की जो भी हमारी परा प्रकृति को जनता है वो यह भी जानता  है की हम ही तेजस्वीओं में तेज हैं। अपरा और परा प्रकृति को जानने वाला व्यक्ति ही अंततः उस ईश्वरीय सूत्र को भी जनता है जो एक मणियों की माला में सूत्र की तरह सब में अनुस्यूत होता है। ऐसा व्यक्ति स्पष्ट रूप से देखता है की ईश्वर ही बुद्धिमानों में बुद्धि, तेजस्वियों में तेज आदि की तरह स्थित है। अर्थात महान तेज का धनी व्यक्ति वो ही होता है जो ऐसे तत्त्व ज्ञान से युक्त होता है, और हनुमानजी का महान तेज उनके ऐसे तत्त्व ज्ञान का ही सूचक है। उनके बारे में कहा ही गया है की वे ज्ञानिनाम अग्रगण्यम हैं। वस्तुतः हनुमानजी ब्रह्मज्ञान के तेज से युक्त हैं इसी लिए उनके तेज की कोई तुलना नहीं है।  यहाँ गोस्वामीजी कहते हैं की आपन तेज सम्हारो आपै – अर्थात ब्रह्मज्ञान को धारण करने वाला हनुमानजी जैसा ही कोई विरला होता है। आप ही ऐसे ब्रह्मज्ञान से जनित तेज को धारण कर सकते हैं। हनुमानजी की तुलना शिवजी से ही करी जा सकती है, जिन्होंने गंगाजी को धारण किया था। जब गंगाजी का अवतरण हो रहा था तो प्रश्न हुआ की गंगा जी को धारण कौन कर सकता है तब पता चला की यह काम तो केवल शिव जी ही कर सकते हैं और तब भगीरथ जी ने उन्हें मनाया। वैसे ही हनुमानजी का तेज वे ही संभल सकते हैं।

आगे गोस्वामीजी कहते हैं की तीनों  लोक हांक  ते कापैं। जब लंका से निकलते हुए उन्होंने हांक लगाइ तो वह इतनी भयंकर थी की लंका में गर्भनियों के गर्भ गिरने लगे। ऐसे थे बजरंगबली हनुमानजी।

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हनुमान चालीसा सत्संग : नवंबर २०१७

नवंबर २०१७ माह का अंतिम रविवार दिनांक २६ को था। इस दिन आश्रम में सायंकाल हनुमान चालीसा सत्संग का मासिक कार्यक्रम था। कार्यक्रम का शुभारम्भ दास बगीची के भक्तों द्वारा सुन्दर भजनों से हुआ।  पूज्य गुरूजी के व्यास पीठ पर पधारने और उनके स्वागत के उपरांत श्री गुलाब चंद व्यास जी ने एक सुन्दर भजन (हरि को भेज ले प्राणी) प्रस्तुत किया और फिर सबने हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया। उसके बाद पूज्य गुरूजी का सवा घंटे का प्रवचन हुआ, जिसमे उन्होंने चालीसा की २२वें चौपाई – सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक कहु को डरना।। – पर प्रवचन किया।

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अपने उद्बोधन में पूज्य गुरूजी ने कहा की इस चौपाई में मनुष्य की दो अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रचलित आवश्यकताओं की पूर्ती के बारे में  गोस्वामीजी सूत्र प्रदान करते हैं। ये हैं सुख और सुरक्षा की प्राप्ति की इच्छा । वे कहते हैं की जो भी हनुमानजी की शरण में जाता है उसे सब प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते हैं – सब सुख लहै तुम्हारी सरना। और जब आप हमारे रक्षक हैं तो हमें किसी बात का डर नहीं है, अर्थात हम सुरक्षित भी हो जायेंगे। ज्यादातर प्रत्येक मनुष्य इन्ही दो आवश्यकताओं के बारें में चिंतित होता रहता हैं और यथासंभव जुगाड़ भी करता रहता है। लेकिन विडम्बना यह है की जीवन भर इस के लिए कार्य करने के बावजूद पर्याप्त सुख और सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है। हमारा प्याला कुछ खाली बचा ही रहता है। अतः यह बिंदु अन्यन्त गंभीर और विचारणीय है। यह तो हम सबके जीवन का ही प्रश्न है। अब सोचना यह है की हम हनुमानजी की शरण में जाएँ तो हमें यह दोनों कैसे प्राप्त हो जायेंगे, क्या देवता लोग ही किसी के जीवन में किसी चीज़ के भाव-आभाव के हेतु होते हैं, क्या किसी गरीबी आदि के किये भगवान जिम्मेदार होते हैं, और अगर हम उनके शरण में चले गए तो वे अपना आदमी देख कर हमें सुखी आदि कर देते हैं। भले दुनियां में हम ऐसा देखते हैं की किसी नेता अथवा सेठ आदि के साथ जुड़ जाएँ तो वे भी हमारी आवश्यकताओं को देख लेते हैं, लेकिन ईश्वर के बारे में ऐसा सोचना उचित नहीं है। हम अपनी आँख ठीक से खोले तो सब को दिखता है की हम सब पर ईश्वर की अपार कृपा बरस रही है। कमी हमारे तरफ से है। हमारा अभाव और असुरक्षा हमारे मन से समस्याएं हैं, जिसे हमें ही ठीक करना होता है। ऐसे अनेकानेक दृष्टांत दुनिया में विराजमान हैं जिन्होंने अपने जीवन में अनेकानेक समस्यों और अभावों के बावजूद ने साहस और बुद्धिमत्ता से अपने जीवन में उत्कर्ष उत्पन्न कर लिया। इसलिए हमारी शरणागति ईश्वर के कर्तव्य का विधान और निरूपण नहीं है, बल्कि हमारे मन में कुछ परिवर्तन का सूचक है। अगर देवता लोग भी किसी की व्यक्तिगत सेवा और शुश्रुषा के वजह से ही हमारी देख भाल  करते हैं तो वे भी स्वार्थ और राग-द्वेष से कलुषित हो जायेंगे और वे भी सामान्य व्यक्तियों की तरह विकारी हो जायेंगे। अतः शरणागति कुछ हमारे अंदर ही परिवर्तन की सूचक और औषधि है।

हम लोग जिसके भी प्रति शरणागत होते हैं उसके गुणों का अपने अंदर समावेश होने लगता है। वे स्वाभाविक रूप से हमारे आदर्श होते हैं। हम लोग स्वाभाविक रूपा से उनके आचार और विचार का अनुकरण करने लगते हैं, और इस तरह से उनके गुणों का समावेश अपने अंदर होने लगता है, और यह ही सबसे महत्वपूर्ण बात होती है। अब अगर हम हनुमानजी के प्रति समर्पित होते हैं तो उनके जैसी रामजी के प्रति शरणागति, साहस, निडरता, विनम्रता और बुद्धिमत्ता आदि देख कर, उसी रंग में रंगने लगते हैं। ईश्वर जब हम सब पर कृपा करते हैं तो हमें बिना कर्म के कोई फल नहीं देते हैं, वे हमें कर्म करने की कला और प्रेरणा देते हैं, और बाकि सब तो फिर स्वतः प्राप्त हो जाता है। अपने मन के परिवर्तन से वस्तुतः समस्या ही नहीं रहती है, और इस तरह से मनो हमारे प्रभु हम पर कृपा कर देते हैं। बस इसके लिए हमे शरणागति का रहस्य समझना चाहिए। वेदांत में जिसे निषेध कहते हैं उसे ही भक्ति शास्त्र में शरणागति कहते हैं। वेदांत कहता है की जब जीव-भाव का निषेध होता है तभी ब्रह्म-स्वरुप आत्मा का साक्षात्कार होता है। भक्ति शास्त्र शनै-शनै हमारे जीव-भाव को शिथिल करते हुए निवेदित करा देता है। अतः उसका रहस्य ठीक से जानना आवश्यक है।

शरणागति के छे अंग होते हैं। कहा गया है : अनुकुलस्य संकल्पः, प्रतिकुलस्य वर्जनं, राक्षिष्यति इति विश्वासः। गोप्तृत्वे वारणं तथा, आत्म-निक्षेप, कार्पण्ये, शरणागति षड्विधा। अर्थात हमारे इष्ट के लिए जो भी अनुकूल है उस अनुकूल कार्य को करने का निश्चय ; उन्हें जो भी अच्छा नहीं लगता है उस प्रतिकूल कार्य आदि से दूर रहना ; अपने मन में पूर्ण विश्वास होना की वे हमारी रक्षा करेंगे ; अपने इष्ट देवता को ही अपना पालक और स्वामी समझना ; उनके प्रति पूर्ण समर्पण होना, अर्थात जब भी हम उनकी सन्निधि में हों अथवा उनका स्मरण भी करें तब हमारे सब अभिमान समाप्त होते दिखाई पड़ें, अंदर तक एक हलकापना आ जाये, ये आत्म-निक्षेप है ; और अंतिम गुना सरलता और निरभिमानता का सूचक है। जिसमे भी ये गुण आते हैं वो ही शरणागति की साधना के पथ पे चलता है। ऐसा व्यक्ति न केवल अपने राग और द्वेष दूर करने लगता है बल्कि अभिमान को भी दूर करने लगता है। और साथ ही साथ अपने इष्ट के गुणों, ज्ञान, और भक्ति आदि को भी अपने अंदर समाविष्ट करने लगता है। इस तरह से उसका मन आमूल परिवर्तित हो जाता है। ऐसे मन में एक दिव्य शांति और सुख स्वाभाविक रूप से ही होता है। उसे किसी का भी डर नहीं रह जाता है, और वो अन्यन्त सुरक्षित महसूस करने लगता है। इस तरह से गोस्वामीजी की ये बात सार्थक हो जाती है की सब सुख लहे तम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना। हमारे भगवान् सीधे कुछ न करने के द्वारा कितना कुछ कर देते है, भक्त इस परिवर्तन का श्रेय भी अपने भगवन को ही देता है, और ज्यादा विनम्र और शरणागत हो जाता है। मन जितना शांत और निर्मल होता है, उतनी ही बुद्धि और विकसित होने लगाती है, और वो वेदांत प्रतिपादित जीव-ब्रह्म के रहस्य गहरायी से समझने लगता है और अपने प्रफु से अंततः एक होक जीता है – ऐसे व्यक्ति को तो परम सुख का अक्षय भंडार मिल जाता है और वो पूर्ण सुरक्षित भी हो जाता है। पूज्य गुरूजी ने अनेकानेक सुन्दर एवं सरल दृष्टांतों से ये सब बातें बताई।

अंत में सबने मिलकर प्रेम से हनुमानजी की आरती करी तथा प्रसाद ग्रहण कर प्रस्थान किया।

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हनुमान चालीसा सत्संग : अक्टूबर २०१७

अक्टूबर महीने का हनुमान चालीसा सत्संग का कार्यक्रम दिनांक  २९ अक्टूबर को वेदांत आश्रम के शंकराचार्य सभागृह में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का प्रारम्भ पूर्ववत सुन्दर  भजनों  से हुआ, और फिर सबने हनुमान चालीसा का पाठ  किया। तदुपरांत  पूज्य गुरूजी ने हनुमान चालीसा की २२ वीं  चौपाई पर अपना प्रवचन प्रारम्भ किया – सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक कहु को डरना। 

उन्होंने कहा की जो भी हनुमानजी की शरण में जाता है उसे सब प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते हैं, तथा उसके सब प्रकार के डर भी समाप्त हो जाते हैं। इस चौपाई में एक बहुत मूलभूत बात कही जा रही है।  एक तो प्रत्येक मनुष्य सुख और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए सतत लगा रहता है, दूसरी बात यह है, की ये दोनों चीजें हमारे अभिमान के करना ही अप्राप्य हो जाती हैं, न की किसी बाहरी कारणों  से, और जैसे ही मनुष्य शरणागति की अंतःस्थिति को प्राप्त करता है फिर मनो जिसके प्रति वो शरणागत होता है वो देवता उसे इन दोनों जरूरतों को पूरा कर देता है। सुख और सुरक्षा की प्राप्ति का रहस्य शरणागति के रहस्य में छुपा हुआ है। स्वामीजी ने हनुमानजी के अनेकानेक भक्तों के दृष्टांत दिए जिन्होंने हनुमानजी के प्रति शरणागति के करना जीवन में अकल्पनीय सुख और समृद्धि प्राप्त की। उनमे गोस्वामी तुलसीदास जी भी शामिल हैं, आधुनिक काल में एप्पल कंपनी के स्टीव जॉब्स भी हनुमानजी के ऐसे ही भक्तों में एक हैं।  वे नैनीताल के पास स्थित नीमकरोली बाबा के आश्रम में रहे थे और बाबाजी हनुमानजी के बहुत बड़े भक्त थे, उनके जीवन में उनकी कृपा से बहुत बड़ा परिवर्तन आया।

जब तक मनुष्य मूलभूत सुख और सुरक्षा प्राप्त नहीं कर लेता है तब तक वह निःस्वार्थ नहीं हो पता है, और जब तक निःस्वार्थ नहीं होता है तब तक वो अच्छा और बड़ा सोच भी नहीं पता है।  इस लिए इन दोनों आवशयक्ताओं की पूर्ती जीवन के साफल्य के लिए अत्यंत आवश्यक होती हैं। पूज्य गुरूजी ने कहा की – शरणागति क्या होती है और कैसे करि जाती है – इस विषय में हम लोग अगली सत्र में प्रवेश करेंगे।

इसी दिन अभी दो दिन पूर्व समाप्त हुए गीता ज्ञान यज्ञ के उपलक्ष्य में एक भंडारे का भी आयोजन हुआ। विशेष प्रसन्नता की बात यह थी की उस दिन आंवला नवमी का शुभ पर्व भी था, इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा होती है और इसके निचे बैठ के भोजन भी किया जाता है। इसके बारे में कथा आती है की इस दिन आंवले के पेड़ में भगवन विष्णु और शिवजी दोनों का वास होता है। आश्रम में एक आंवले के पेड़ की व्यवस्था की गयी और उसकी पूजा की तैयारी भी की गयी, अनेकों भक्तों ने पूजा का आनंद लिया और सुंदरता से सजाय गए पेड़ की परिक्रमा की। बाद में श्री सुनील गर्ग जी के द्वारा सभी को भंडारे प्रसाद का आयोजन किया गया।

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Hanuman Chalisa Satsang: Aug 2017

The Aug 2017 edition of Hanuman Chalisa Satsang was organized in the Ground Floor Satsang Hall of Vedanta Ashram, on 27th Aug. The program began with lovely bhajans. The bhajans were predominantly dedicated to Ganeshji because of the ongoing Ganesh Chaturthi Festival. Later when Poojya Guruji came on the Vyasa Peeth, he was welcomed with garland by Sunil Kumar Ojha and Gulab Chandra Vyasa, and a congregational chanting of Hanuman Chalisa started. This was followed by an inspiring hour long pravachan – on the same 21st chaupayi – राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिन पैसारे।।

In his pravachan, Poojya Guruji said that Hanumanji is shown sitting at the door of Ramji and guarding it, and all those who come with humility alone get the permission to enter the temple of Ramji and get his darshan. What does this mean? It does not mean that Hanumanji only allows all those people whom he likes, but in fact when we look at the nature of Hanumanji, he is someone who is pro-actively encouraging everyone to go near Ramji and get blessed with his devotion. Here Hanumanji is shown as a Sant or rather a Guru, who in fact initiates devotees to be truly blessed with Ramji.

Hanuman Chalisa Satsang: July 2017

The last Sunday of July was on 30th, and we had our monthly Hanuman Chalisa Satsang on that day at Ashram. As usual the program began at 6.30 PM with lovely Bhajans by the Bajrangbali Bhaktas. Later after the arrival of Poojya Guruji on the Vyasa Peetha and his swagat, there was the chanting of Hanuman Chalisa and then he continued his pravachan on the chaupayi on the 21st chaupayi – राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिन पैसारे।।

 

Poojya Guruji said that this chaupayi is one of the finest and has helped him a lot in his sadhana. It says that Hanumanji sits guarding the door to the palace of Bhagwan Sri Ram, and no one can enter inside without his permission. This is a very significant chaupayi, because it reveals the secret of how one can approach & get darshan of the ultimate truth of our self and this entire life. Hanumanji is the key to darshan of Bhagwan Ram. Hanumanji obviously is not someone who can be coerced or bribed to get an entry inside. All his stories reveal that he himself is very happy & enthusiastic when someone approaches Bhagwan and gets blessed by his darshan, yet Hanumanji’s permission is extremely necessary. What does this mean? It means that we need to be blessed with some qualities which a Bhakta & Mahatma like Hanumanji suggests & endorses, and having which qualities Ramji will necessarily be very happy about. If at all there are some blockages, then like in the case of Vibhishan, Hanumanji tries his best to remove those blockages and prepares the person to go and surrender to Ramji. Vibhishan had some doubts about his Rakshas kula, but Hanumanji removed that hesitation and made Vibhishan confidant to go to Ramji and changed the life of a person. So also was the case of Sugriva. Hanumanji was the one who brought about that special friendship.

This chaupayi in fact indicates that for faith & devotion unto God some qualities are required, and a Sant & Mahatma like Hanumanji is one who prepares a devotee for this divine turn. Texts like Narada Bhakti Sutra, reveal to us the requisites of a devotee. While there are certainly some texts which reveal the so called adhikari for Bhakti & Sharanagati, but if one is blessed to have association of a devotee like Hanumanji then we come to be blessed with all the required qualities. We ‘see’ all those qualities – in action, live – and without any doubt that is the best way to appreciate and assimilate all those qualities. There is indeed no better blessing than getting association of a great gyani and devotee. We go to our gurus only to be aware of all the necessary preparations and knowledge which prepare us for the realization of Ramji in our hearts. This is the implication of saying that Hanumanji is sitting outside the door of Ramji’s palace and only after his permission anyone can go inside.

Poojya Guruji elaborated on the word ‘Paisare’, Hanumanji doesn’t allow anyone inside till the person surrenders completely. He said that the unique identity of we Hindus all over the world is Namaskar. Namaskar is a sadhana, it implies seeing the divinity in others, and in the process keeping aside our ego and reveling in the awareness of God. That is called pasarana. It is only those people who can dare to keep aside their ego and become humble, who are as though permitted inside.

 

In the end there was Aarti and prasad for all.

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Hanuman Chalisa Satsang: June 2017

On 25th June 2017 was the last Sunday of the month, it was the day of the monthly Hanuman Chalisa Satsang at Vedanta Ashram, Indore. As usual the program began at 6.30 PM with lovely Bhajans by the Bajrangbali Bhaktas. Later after the arrival of Poojya Guruji on the Vyasa Peetha and his swagat, there was a lovely Bhajan by GC Vyasa (given below) – He Mere Gurudev Pranam.

Then there was the congregational chanting of Hanuman Chalisa. Finally Poojya Guruji Sri Swami Atmanandaji continued his yet another enlightening pravachan on the 20th chaupayi – दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हारे तेते।

Continuing his pravachan on the 20th chaupayi of Hanuman Chalisa, Poojya Guruji said that this chaupayi is right in the center of the chaupayi and is thus having a special place. Its message is also special. Everyone in the world is pursuing some goal or the other, and it should be rightfully be there for all. It is the existence of a goal that life gets to have some meaning & challenge. Whatever we cherish alone becomes the source of our joys & sorrows. So everyone’s life can be summarized in this sentence that first we have a great & durgam goal, and then with hard & intelligent work we make it sugam or attainable. In fact we all should necessarily have some durgam goal and then go about attaining it. That’s the challenge and also the joy of life. Now the question is that how is durgam made into sugam. Here Goswamiji says that belief in God plays an important part in this endeavor. ‘O Hanumanji devotion unto you makes all my durgam challenges so sugam.’ But the question is how?

Do we have to just go & pray to Hanumanji and then he gets the work done. Well, that sounds too childish and is even wrong, obviously there is something more to it. Our devotion & worship etc have no doubt an important but also just a small part to play. That is why we have all the scriptures like Gita etc. Prayers should always be complemented with Self-effort. An intelligent mix of both Prarthana & Purushartha is required. The blessings of faith & devotion is more to be reflected in purushartha. Bhagwad Gita reveals to us that Art of Karma, which has an intelligent mix of both. The point which Poojya Guruji highlighted was firstly the very choice of our goals. Discernment of our goal of life is very critical. It should reflect our deep-rooted inclination. We need to have love to for goal. This has been termed as our ‘swadharma or sahaj karma’, and is as per our varna or prakruti. This is basically that for which the benevolent creator has created us for and sent to this world. We need to look upon us as messengers of God, who has come here for a special mission. If this is how we see ourselves and our goal – then this very perception brings about a paradigm shift in our state of mind & values – all for the better. Whenever love is the foundation of life, then alone man attain the unimaginable, and there are so many examples in the world validating this basic principle. Once a person is a Messenger of God then they shall definitely cherish all that which God teaches us. Our very identity is always associated with God – this is what we see in Hanumanji when he was standing in front of Ravana, and answering his questions about who he really is. Ram-Doota. Ego-centric life alone brings all anxieties & problems in life, and not an inspired loving life in a way by which even the creator is happy. It is this attitude which makes the almost impossible also possible.

After the pravachan there was Aarti and finally prasad was given to all devotees.

 

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