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हनुमान चालीसा सत्संग: जुलाई २०१८

जुलाई २०१८ का मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २९ को वेदांत आश्रम में आयोजिय हुआ। पूर्ववत पहले भक्त मण्डली के द्वारा सुन्दर भजनो का आयोजन हुआ। बाद में पूज्य गुरूजी के आने के बाद हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ हुआ और तत्पश्यात पूज्य गुरूजी का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार उन्होंने २८वीं चौपाई पर प्रकाश डाला – और मनोरथ जो कोई लावै … ।

पूज्य गुरूजी ने अपने प्रवचनों का सार बताने के उपरांत इस बार २८वीं चौपाई में प्रवेश किया। और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।। गोस्वामीजी कहते हैं की वैसे तो हम ने सभी सामान्य मनो कामनाओं की पूर्ती का मार्ग निर्देशन कर दिया है – लेकिन अगर कोई ऐसी इच्छा हो जो कुछ विशेष है तो उस के बारे में भी जान लो की, ‘और मनोरथ जो कोई लावै’ – और वह भक्तशिरोमणि हनुमानजी का आश्रय लेता है तो उनके बारे में भी हम ये आश्वासन देते है की हनुमानजी की भक्ति और आराधना कभी भी विफल नहीं होती है, उनकी भी मनोकामना अवश्य पूरी होती है – सोइ अमित जीवन फल पावै।

इस चौपाई में ‘और मनोरथ’ शब्द विषय महत्त्व का है। अन्य कोई मनोकामना सांसारिक हो सकती है, अथवा वह धार्मिक या आध्यात्मिक हो सकती है। और शब्द से यह मनोकामना असामान्य अवश्य दिखती है। गीता में भगवन कहते हैं की मनुष्याणां सहस्रेषु। … हज़ारों मनुष्यों में कुछ विरले ही सिद्ध होने की आकांशा रखते हैं, और इन में भी कुछ ही आगे तक बढ़ कर हमें प्रामाणिक रूप से जान पाते हैं। वस्तुतः प्रत्येक सिद्धि हमारे लक्ष की स्पष्टता पर निर्भर करती है। जब हम जानेगे ही नहीं तो उस दिशा में प्रार्थना और पुरुषार्थ दोनों असंभव हैं।

पूज्य गुरूजी ने दो विषय उठाये, पहला मनोरथ क्या होते हैं, और दूसरा किसी भी मनोरथ की सिद्धि कैसे होती है। जब हमारा मन किसी लक्ष की सिद्धि के लिए दौड़ता है जैसे की मनो हम किसी गंतव्य की तरफ अपनी गाडी ले जा रहे है, तब उसे मनोरथ कहते हैं। मनोरथ अर्थात कामना, आकांशा। मनोरथ की पूर्ती में कामना की स्पष्टता पर निर्भर करती है अतः ये अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। लक्ष कैसा भी हो सबसे पहले उसे स्पष्ट और दृढ बनाएं, और फिर एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु के बारे में स्पष्टता रखें की लक्ष्य की सिद्धि क्या केवल प्रार्थना से होती है अथवा पुरुषार्थ भी महत्वपूर्ण होता है।  उन्होंने ने बताया की इस महत्वपूर्ण बिंदु पर हम लोग अगले सत्र में चर्चा करेंगे।

कार्येक्रम के अंत में पूर्ववत आरती और प्रसाद वितरण हुआ।

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हनुमान चालीसा सत्संग: जून २०१८

जून २०१८ का मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २४ को वेदांत आश्रम में हुआ। पूर्ववत पहले भक्त मण्डली के द्वारा सुन्दर भजनो का आयोजन हुआ। बाद में पूज्य गुरूजी के आने के बाद हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ हुआ और तत्पश्यात पूज्य गुरूजी का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार उन्होंने २७वीं चौपाई पर प्रकाश डाला – सब पर राम तपस्वी राजा … ।

पूज्य गुरूजी ने अपने उद्बोधन में बताया की २७वीं चौपाई में गोस्वामीजी ने पहले भगवन श्री राम की महिमा बताई और फिर बतया की ऐसे प्रभु के समस्त कार्य हनुमानजी ने संपन्न करे। यह शैली एक साहित्यिक अलंकार है। अतः हमें भी इस चौपाई को समझने के लिए पहले रामजी की महिमा का स्मरण करना चाहिए। रामजी तो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं उन्होंने तो समस्त क्षेत्र में मर्यादाओं की स्थापना की है। आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श शिष्य, आदर्श पति, आदर्श  मित्र, और सबसे महत्वपूर्ण है आदर्श राजा। वे तो धर्म के मूर्तिमान स्वरुप थे। पूरी रामायण उन्ही की महिमा का बखान कर रही है। रामजी का अवतरण त्रेता युग में हुआ था लेकिन आज भी उनका राज्य आदर्श राज्य की तरह से जाना जाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जिनके कठिन प्रयास और सूझ-बुझ से देश को आज़ादी मिली वे नित्य रामजी का भजन किया करते थे, और स्वतंत्र भारत में राम राज्य की स्थापना उनका भी सपना था।

ऐसे समर्थ और ज्ञानी रामजी ने जितने भी विशेष कार्य संपन्न किये उन सभी में ज्यादातर हनुमानजी उनके चुने हुए निमित्त थे। किसी भी राजा की विशेषता मूल रूप से उसकी दूर-दृष्टी और व्यापक निति होती है, और कोई भी निति तभी सफल होती है जब उसका उचित क्रियान्वयन हो। हनुमानजी क्रियान्वयन के सबसे सूंदर अधिकारी और पात्र थे। हनुमानजी के जीवन और शब्द कोष में असंभव शब्द था ही नहीं, इसलिए रामजी का जो भी संकल्प होता था उसकी सिद्धि सुनिश्चित हो जाती थी।

कुछ लोगो के मन में यहाँ पर एक विचार आ सकता है, की हनुमानजी की ही वजह से रामजी से समस्त कार्य संभव हो पाए। लेकिन जो भी ऐसा विचार भी लता है वह हनुमानजी सो समझता ही नहीं है, और ऐसे विचार से वह हनुमानजी का आशीर्वाद नहीं प्राप्त करेगा बल्कि उनके आक्रोश का भागी बनेगा, क्योंकि हनुमानजी के दृष्टिकोण से यह पूर्णरूप से असत्य है।  जब लंका से वे लौटे तब भगवन श्री राम ने उनके स्तुति करी और पुछा की हनुमान यह तो बताओ की यह सब असंभव तो तुमने कैसे संभव कर दिया। इस पर हनुमानजी बोले की प्रभु हम जो भी करते हैं वो सब आपकी ही महिमा है, हम तो एक वानर मात्र हैं यह आपकी ही महिमा है की एक वानर को भी इतना महिमा मंडित करवा देता है। अतः रामजी की महिमा केवल ाची निति आदि बनाना नहीं है, बल्कि असमर्थ को समर्थ बना के उससे असंभव कार्य करावा देते हैं। रामजी तो त्रिलोक विजेता रावण की लंका को मात्र वानरों की सेना से जीत लेते हैं। अतः हनुमानजी की महिमा भी प्रभु राम की ही महिमा है।

इस चौपाई में एक बात और कही गयी है, और वो है रामजी ऐसे महान कैसे बने। उन्होंने एक शब्द का प्रयोग किया है और वो हैं – तपस्वी। तपस्या ही व्यक्ति तो निर्मल कर देती है वो ही व्यक्ति को महान बनाती है। भगवान का चौदह वर्ष का वनवास शायद सभी को यह ही सन्देश दे रहा है। तपस्वी व्यक्ति काम से काम चीजों में अपना जीवन सुख पूर्वक जीना सीख गया है। इसलिए वो अपने स्वार्थ की नहीं सोचता है। जो स्वार्थ से मुक्त है वो ही सबके कल्याण के बारे में सोच सकता है। पूज्य गुरूजी ने कहा की इस तपस्या के विषय पर वे अगली बार विस्तृत रूप से चर्चा करेंगे।

कार्येक्रम के अंत में पूर्ववत आरती और प्रसाद वितरण हुआ।

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हनुमान चालीसा मासिक सत्संग: मई २०१८

मई २०१८ का मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २७ को वेदांत आश्रम में हुआ। पूर्ववत पहले भक्त मण्डली के द्वारा सुन्दर भजनो का आयोजन हुआ। बाद में पूज्य गुरूजी के आने के बाद हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ हुआ और तत्पश्यात पूज्य गुरूजी का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार भी उन्होंने २५वीं और २६वीं चौपाईयों में सूचित साधनाओं पर प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया की यह बात निश्चित रूप से सत्य है की जैसे २५वीं चौपाई में कहा गया है की हनुमानजी की कृपा से सब रोग नष्ट हो जाते हैं और पीड़ाएँ भी समाप्त हो जाती हैं, और २६वीं चौपाई में बताया गया है की हनुमानजी हम सबको संकट से छुड़ा देते हैं – लेकिन यहाँ एक बात दृष्टव्य है की ऐसी कृपा की प्राप्ति के लिए हमारा भी कुछ पुरुषार्थ आपेक्षित है। अगर कोई यह सोचे की केवल निवेदन करने से हनुमानजी यह सब कर देंगे, तो यह पूर्ण सत्य नहीं है। गोस्वामीजी ने स्पष्ट कहा है की २५वीं चौपाई का फल तो तभी प्राप्त होगा जब हम – जपत निरंतर हनुमत वीरा। हमें निरंतर हनुमानजी की महिमा का जप करना चाहिए। जप साधना की बहुत महिमा है। गीता में भी कहा गया है की – यज्ञानां जपयज्ञोस्मि। जप का प्रयोजन अपने इष्ट का सतत संज्ञान बताये रखना होता है। यह स्मरण परिस्थिति निरपेक्ष होना चाहिए। परिस्थिति अच्छी हो या बुरी ईश्वर का भान जो भी बनाये रखता है उसे कोई भी संकट कैसे आ सकता है। संकट तो तभी आता है जब कुछ अपने छोटे से कंधों पर बोझा आ जाता है। जब हमें लगता है की सब कुछ हम ही करते हैं। ऐसे लोग ही तनाव ग्रसित हो जाते हैं।

२६वीं चौपाई में गोस्वामीजी कहते हैं की यहाँ भी संकट से निवृत्ति नैमित्तिक है। उसी व्यक्ति का सब संकट दूर हो जाएगा जो एक विशेष साधना की सिद्धि करेगा। और वो है – मन क्रम वचन धयान जो लावै। संकट से निवृत्ति, हनुमानजी के सुन्दर ध्यान रुपी साधना का आशीर्वाद है। यह ध्यान भी बहुत समग्रता से होना चाहिए। वे कहते हैं की जो व्यक्ति मन, कर्म और वचन तीनों धरातल का प्रयोग करता हुआ भगवन का ध्यान करता है – उस ध्यान से ही एक विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। केवल धयान ही नहीं बल्कि कोई भी काम जब समग्रता से किया जाये तब ही हमें सफलता प्रदान करता है।  हनुमानजी उस जीवन दर्शन के प्रतिक हैं जो अपने लिए नहीं बल्कि अपने भगवन राम के लिए ही जीते हैं।  ऐसे निःस्वार्थ व्यक्ति को अपनी तो कोई समस्या होती ही नहीं है।  अतः ऐसे भक्तों के निश्चित रूप से सब संकट दूर हो जाते हैं।

अंत में पूज्य गुरूजी २७वीं चौपाई में मात्र प्रवेश करते हुए भगवन श्री राम जो सबसे उत्कृष्ट हैं उनके भी कार्य हनुमानजी पूरे करते हैं इसीसे हम सबको हनुमानजी की महिमा का ज्ञान होता है।  इस चौपाई की विस्तृत चर्चा २४वीं  जून को होगी। कार्यक्रम का समापन आरती और प्रसाद वितरण से हुआ।

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हनुमान चालीसा सत्संग: अप्रैल २०१८

अप्रैल २०१८ का हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २९ अप्रैल को वेदांत आश्रम में आयोजित हुआ। पूर्ववत पहले सुन्दर भजनों  की प्रस्तुति हुई और फिर पूज्य गुरूजी के व्यास पीठ पर पधारने के बाद सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ हुआ। तदोपरांत प्रवचन का प्रारम्भ हुआ। उसमे पहले २५वीं चौपाई पर चर्चा हुई और फिर २६वीं चौपाई में प्रवेश हुआ।

 

२५वीं चौपाई पर चर्चा करते हुए पूज्य गुरूजी ने बताया की रोग स्थूल शरीर में होते हैं और पीड़ा मन में होती है, रोग भी दर्द देता है, लेकिन आसक्त और अज्ञानी मन पीड़ा को कई गुना बढ़ा देता है। कई बार तो मन अनेकानेक समस्यों की उपेक्षा करके व्यथा से मुक्त भी रह सकता है। अतः अगर मन विवेकी होता है तो हमारे विविध रोग और तद्जनित पीड़ाएँ नष्ट-प्रायः हो जाती हैं। इस अत्यंत कल्याणकारी सिद्धि के लिए यहाँ गोस्वामीजी कहते हैं की व्यक्ति में निरंतर जप का सामर्थ्य होना चाहिए। शरीर और मन के विकारों से मुक्त रहने का सामर्थ्य की प्राप्ति में जप का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता है। जप में हम अपने मन को धन्यता से ईश्वर के चरणों में लगाना सीखते हैं। जब मन हमारी इच्छा से कहीं और लग सकता है तो स्वाभाविक है की बाकि किसी चीज की संवेदना नहीं रहती है। कोई भी अनुभूति हम लोगों की मानसिक संवेदना पर ही आश्रित होती हैं। अतः अपनी प्रेरणा के आस्पद के चरणों में मन लगा पाने की सिद्धि हमें विकारों से अप्रभावित कर देती है। यह हमारे इष्ट की ही कृपा से होता है।

जप के बारे में पूज्य गुरूजी ने आगे बताया की जप जो की ईश्वर की एक विभूति है, उसके तीन सोपान हैं – उच्च जप, मंद जप, और चित्तजम जप, और इसका पर्यवसान ध्यान की सिद्धि में होता है। इन तीनो के बारे में संक्षेप में बताया गया, और सभी को नित्य ईश्वर के नाम का जप करने की प्रेरणा दी गयी, तथा निरंतर जप का भी आशय बताया गया। निरंतर जप का आशय सतत ईश्वर की सन्निधि का अनुभव होता है – जो की परिस्थिति निरपेक्ष हो। अर्थात सुख हो अथवा दुःख, ईश्वर के अस्तित्व और माहत्म्य का सतत अनुभव और स्मरण होता है। विवेकी व्यक्ति रोग आदि का बाहरी उपचार तो करता ही है, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण मन का सामर्थ्य होता है। यह ही इस सुन्दर चौपाई का रहस्य है।

२६वीं चौपाई में प्रवेश करते हुए उन्होंने बताया की गोस्वामिजी कहते हैं की जप की सिद्धि का पर्यवसान ध्यान के सामर्थ्य की प्राप्ति होती है, और जब यह सामर्थ्य प्राप्त होने लगता है तब तो हनुमानजी की कृपा से कोई संकट रहते ही नहीं हैं। ध्यान की महिमा को आज विश्व ने जाना है, इसीलिए इसकी इतनी प्रसिद्धि हो गयी है। ध्यान में किसी वस्तु में हमारा मन तल्लीन हो जाता है। मन न रहे दस-बीस अतः एक मन कहीं लीं हो जाता है तो कोई संकट नहीं रहता है। ऐसे व्यक्ति की बुद्धि भी विकसित होने लगती है, अतः किसी भी समस्याओं का प्रामाणिक उपचार का शोध होता है और असंगता भी। पूज्य गुरूजी ने कहा की इस विषय को अगले सत्र में आगे चर्चा के लिए लेंगे।

अंत में आरती और प्रसाद वितरण हुआ।

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हनुमान चालीसा सत्संग: मार्च २०१८

वेदांत आश्रम में दिनांक  25/3 को मार्च मॉस के मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन हुआ। प्रारम्भ में पूर्ववत भजनो का कार्यक्रम हुआ, और फिर हनुमान चालीसा के पाठ  के बाद पूज्य गुरूजी श्री स्वामी आत्मानंदजी महाराज का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार भी कुछ समय २४वीं  चौपाई पर चर्चा करने के बाद २५वे चौपाई (नाशै  रोग हरै  सब पीरा।  जपत निरंतर हनुमत बीरा।।) में प्रवेश हुआ।

पूज्य गुरूजी ने बताया की भूत और पिशाच काम और क्रोध के अतिरेक की अभिव्यक्तियाँ होते हैं। वैसे भी जब किसी को काम और क्रोध का आवेश आता है – तो भी वह भूत की ही तरह उसके ऊपर चढ़ कर उन्हें अपने वश में कर अकल्पनीय काम करवा देता है, जब मनुष्य अपने वश में नहीं रह पता है, लेकिन अत्यंत जोश में कार्य भी करता है – तभी कहा जाता है की उसके ऊपर कोई भूत सा चढ़ गया है।  पिशाच क्रोध के अतिरेक की बाह्य अभिव्यक्ति होती है – ऐसे लोग हिंसक भी हो सकते हैं। जहाँ भूत मनुष्य को बेबस करके कुछ कार्य करवाता है, वहीँ, पिशाच मनुष्य को संवेदनाविहीन करके हिंसक भी कर देता है। ऐसे लोगों को देखा जाये तो एक बात स्पष्ट दिखती है की ये लोग मूल रूप से स्वार्थ से ही प्रेरित होते हैं। दूसरी तरफ भक्ति तो अपने आराध्य के प्रति शरणागति है। भक्त तो यह देखता है की जो भी चल रहा है वो सब ईश्वर की ही कृपा से चल रहा है, और इस तरह वो अपने स्वार्थ प्रेरित आकांक्षाओं से मुक्त रहता है। सात्त्विक मन में काम और क्रोध आदि विकारों के अस्तित्व नहीं होता है, अतः भूत-प्रेत आदि का चढ़ना उनके जीवन में नहीं होता है। बल्कि अगर किसी के ऊपर ऐसी कुछ छाया भी हो तो धन्यता की प्रतिमूर्ति हनुमानजी के स्मरण मात्र से दूर हो जाती है।

पूज्य गुरूजी ने बताया की यद्यपि यह चौपाई भूत-पिशाच से निवृत्ति के उपाय बताने के कारण अत्यंत प्रसिद्ध है, क्यूंकि अज्ञानी लोगों को अनेकानेक चीज़ों का डर  लगा रहता है, लेकिन इस चौपाई की विवक्षा मूल रूप कुछ और है। मूल विवक्षा तो महावीर के नाम उच्चारण की महिमा है।

कार्यक्रम का समापन आरती और प्रसाद से हुआ।

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हनुमान चालीसा सत्संग – फरवरी २०१८

वेदांत आश्रम में दिनांक  18/२ को फरवरी  मॉस के मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन हुआ। प्रारम्भ में पूर्ववत भजनो का कार्यक्रम हुआ, और फिर हनुमान चालीसा के पाठ  के बाद पूज्य गुरूजी श्री स्वामी आत्मानंदजी महाराज का प्रवचन प्रारम्भ हुआ। इस बार २४वीं  चौपाई पर प्रवचन हुआ – भूत पिशाच निकट नहीं आवे। महावीर जब नाम सुनावे।।  प्रारम्भ में गाया हुआ एक सुन्दर भजन :

 

उन्होंने बताया की भूत और पिशाच तामसी योनियां होती हैं, जो की मूल रूप से काम और क्रोध के अतिरेक की अग्रिम रूप और अभिव्यक्ति होती हैं। हमारे मन में जो भी विकार होते हैं वे जब प्रबल हो जाते हैं तब वे बाहर भी अभिव्यक्त हो कर दिखने लगते हैं। ईश्वर की भक्ति से युक्त होकर उनका अपने आखों से दर्शन भी इसी सिद्धांत के अनुरूप होता है। दुनियां में होती तो बहुत सारी चीजें हैं लेकिन दिखते वो ही है जिसका हमारे मन में महत्त्व होता है। जो भूतकाल की अतृप्त कामनाओं से व्यथित होते हैं उन्हें उनका भूतकाल अपनी चिंताओं और डर से युक्त होकर भूत के रूप में प्रगट होकर डराता रहता है। और जो अपनी अपूर्त आकांक्षाओं के कारण किसी न किसी बाह्य हेतु को उसका जिम्मेदार समझते हैं वे क्रोध की आग में जलते हैं और यह ही अपने अग्रिम रूप में पिशाच बनकर उन्हें डराता रहता है। ऐसे लोगों की दृष्टि से भूत पिशाच निश्चित रूप से होते हैं और उन्हें न केवल दिखते हैं बल्कि उन्हें डराते भी हैं। इन सब सिद्धांत का प्रमाण यह है की ये ही भूत आदि दूसरों को दिखते भी नहीं हैं। वेदांत का सिद्धांत है की हमारी दृष्टि ही सृष्टि उत्पन्न करती है, अतः जिन लोगों  को दिखते हैं वे सब उनके लिए निश्चित रूप से सत्य होते हैं, और उनका उचित उपचार करना आवश्यक होता है।

नकारात्मक सोच के शारीरिक अथवा मानसिक दुष्परिणाम किसी औषधियों से नहीं बल्कि सकारात्मक सोच से ही स्थायी रूप से दूर करे जा सकते हैं।  अतः गोस्वामीजी कहते हैं की जो-जो लोग ऐसे दुष्परिणामों के शिकार हैं उनके लिए हनुमानजी का नाम ही पर्याप्त है। अच्छाई के अस्तित्व की आस्था बुराई की निवृत्ति का पहला कदम होती है। अतः हनुमानजी के नाम मात्र का उच्चारण इन भूत और पिशाचों को दूर भगा देता है। हनुमानजी जैसे भक्तों के चरित्र का चिंतन आगे चल के हमें काम-क्रोध आदि विकारों से ही मुक्त करके भक्ति का प्रसाद प्रदान कर देता है। यह ही बात इस चौपाई में बताई गई है।

कार्यक्रम का समापन आरती और प्रसाद से हुआ।

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हनुमान चालीसा सत्संग : जनवरी २०१८

जनवरी २०१८ माह का मासिक हनुमान चालीसा सत्संग का आयोजन दिनांक २१ जनवरी को था। कार्यक्रम का शुभारम्भ सूंदर भजनों  से हुआ और फिर सबने हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ  किया। तदुपरांत पूज्य गुरूजी स्वामी आत्मानंद जी ने अपना प्रवचन चालीसा की २३ वी चौपाई (आपन तेज सम्हारो आपै। ..) पर ही आगे बढ़ाया।

अपने प्रवचन में पूज्य गुरूजी ने बताया की हनुमानजी का तेजस अतुल्य है, गोस्वामीजी कहते हैं की केवल वे ही इसे धारण कर सकते हैं। इतना तेजस धारण करने की क्षमता एक सामान्य मनुष्य अथवा योनि में नहीं दिखती है। उन्होंने इसकी तुलना भगवान शंकर से की जब उन्होंने गंगाजी को धारण किया था। जैसे गंगाजी को धारण करने वाला और कोई नहीं है, उसी तरह हनुमानजी का तेजस है। गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं की वे ही तेजस्वीओं का तेज हैं अतः तेज ईश्वर  की ही आभा है। हनुमानजी का अंत्यंत महान तेज उनके सबसे महँ ज्ञान से युक्त होने का प्रमाण है – वे रामजी के तत्त्व के ज्ञाता है। वे ब्रह्म ज्ञानी हैं। इसी लिए इतने तेजस्वी हैं।

आगे गोस्वामीजी कहते हैं की – तीनों लोक हांक ते कापै, जब हनुमानजी लंका से वापस जा रहे थे तब उन्होंने बड़ी जोर से चिक्खार करि, आवाज़ की, गर्जना करी – उसे सुन कर लंकावासिओं की हृदयगति थमने सी लगी, गर्भिणियों के गर्भ गिरने लगे। ये सब एक अत्यंत बलवान और उत्साही व्यक्ति का सूचक है।

भगवद गीता का हवाला देते हुए पूज्य स्वामीजी ने कहा की जब अर्जुन को भगवन ने स्थित प्रज्ञ के बारे में बताया तो उसने अपनी और जिज्ञासा प्रगट करते हुए पूछा की स्थित प्रज्ञ के बारे में कृपया और बताएं – की उसके लक्षण क्या होते हैं, वह अपने साथ होता है तो कैसा होता है, और जब दुनिया की विविध परस्थितियों में वो अभिव्यक्तियाँ करता है तो वो कैसी होती हैं आदि, इसी तरह से यहाँ पर गोस्वामीजी हनुमानजी जैसे अदभुत ज्ञानी के बारे में पूछता है की वे जब अपने साथ होते हैं तो कैसे होते हैं और जब विविध परस्थितियों में अभिव्यक्तियां करते हैं तो वो कैसे होती हैं – इसी का उत्तर दे रहे हैं. की सामान्य रूप से वे तेज के पुंज हैं। और जब विविध परिस्थियों में अभिव्यक्त होते हैं तो वह अंत्यंत समग्र होती है।  यह ही दिव्य तेज और भयंकर हांक शब्दों से कह रहे हैं।

इस कार्यक्रम में पूज्य गुरूजी के एक पुराने शिष्य स्वामी माधवानंद जी, जो के चिन्मय मिशन रांची में कार्यरत हैं गुरूजी के दर्शन हेतु आये थे। उन्होंने भी अंत में आभार के दो शब्द कहे। कार्यक्रम सा समापन आरती से हुआ।

 

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Hanuman Chalisa Satsang: Dec 2017

दिसम्बर २०१७ का अंतिम हनुमान चालीसा सत्संग साल के अंतिम दिन और अंतिम रविवार दिनांक ३१ को वेदांत आश्रम में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का प्रारम्भ सुन्दर भजनो से हुआ। सुनील कुमार ओझा और गुलाब चाँद व्यास जी ने पूज्य गुरूजी स्वामी आत्मानंद जी का स्वागत पुष्प माला से किया। सबने सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ  किया, और फिर राम-नाम संकीर्तन के बाद प्रवचन का शुभारम्भ हुआ। इस बार चालीसा की २३वीं  चौपाई पर चिंतन हुआ – आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों  लोक हाँक ते कापै ।।

अपने प्रवचन में पूज्य गुरूजी ने बताया की हनुमानजी अत्यंत तेजस्वी हैं, और कोई भी ऐसा नहीं हैं जो उनके तेज का पराभव कर सके। पराभव तो दूर की बात है कोई उनका सामना भी नहीं कर सकता है। व्यक्तित्व का तेज अनेकों प्रकार से अभिव्यक्त होता है – चेहरे की दिव्य चमक, शरीर में उत्साह, विचारों में उमंग और सूक्ष्म विचार, और मन में निर्भीकता और अन्य दैवी गुण । तेज से युक्त व्यक्ति में कोई चिंता, भय और तनाव आदि का तो नामोनिशान नहीं दिखता है। आज के समय में जब तनाव का चारों तरफ बोलबाला और साम्राज्य है लोग मानों तेज विहीन से हो गए हैं। अच्छी शिक्षा और संस्कार व्यक्ति को सुन्दर और तेजस्वी व्यक्तित्व का धनी बना देते हैं। वो ही ज्ञान सुन्दर और कल्याणकारी है जो हमें सुन्दर और तेजस्वी व्यक्तित्त्व से युक्त करे। ऐसे व्यक्ति के लिए समस्याएं भी मात्र परिस्थिति बन जाती हैं, और जो इनसे विहीन होते हैं उनके लिए है एक परिस्थिति भी समस्या बन जाती है। एक निर्मलानंद जी महाराज जी ने कहा है – पहले हम कतरे को भी दरिया समझ कर डूब जाते थे , लेकिन निर्मल अब तो हम दरिया को भी कतरा समझते हैं। यह ही हनुमान जी के व्यक्तित्व का लक्षण था। उन्होंने दरिया को कतरे की तरह ही देखा और आसानी से कूद गए। और आगे भी क्या क्या किया यह सामान्य व्यक्तियों के लिए अकल्पनीय था।

गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं की जो भी हमारी परा प्रकृति को जनता है वो यह भी जानता  है की हम ही तेजस्वीओं में तेज हैं। अपरा और परा प्रकृति को जानने वाला व्यक्ति ही अंततः उस ईश्वरीय सूत्र को भी जनता है जो एक मणियों की माला में सूत्र की तरह सब में अनुस्यूत होता है। ऐसा व्यक्ति स्पष्ट रूप से देखता है की ईश्वर ही बुद्धिमानों में बुद्धि, तेजस्वियों में तेज आदि की तरह स्थित है। अर्थात महान तेज का धनी व्यक्ति वो ही होता है जो ऐसे तत्त्व ज्ञान से युक्त होता है, और हनुमानजी का महान तेज उनके ऐसे तत्त्व ज्ञान का ही सूचक है। उनके बारे में कहा ही गया है की वे ज्ञानिनाम अग्रगण्यम हैं। वस्तुतः हनुमानजी ब्रह्मज्ञान के तेज से युक्त हैं इसी लिए उनके तेज की कोई तुलना नहीं है।  यहाँ गोस्वामीजी कहते हैं की आपन तेज सम्हारो आपै – अर्थात ब्रह्मज्ञान को धारण करने वाला हनुमानजी जैसा ही कोई विरला होता है। आप ही ऐसे ब्रह्मज्ञान से जनित तेज को धारण कर सकते हैं। हनुमानजी की तुलना शिवजी से ही करी जा सकती है, जिन्होंने गंगाजी को धारण किया था। जब गंगाजी का अवतरण हो रहा था तो प्रश्न हुआ की गंगा जी को धारण कौन कर सकता है तब पता चला की यह काम तो केवल शिव जी ही कर सकते हैं और तब भगीरथ जी ने उन्हें मनाया। वैसे ही हनुमानजी का तेज वे ही संभल सकते हैं।

आगे गोस्वामीजी कहते हैं की तीनों  लोक हांक  ते कापैं। जब लंका से निकलते हुए उन्होंने हांक लगाइ तो वह इतनी भयंकर थी की लंका में गर्भनियों के गर्भ गिरने लगे। ऐसे थे बजरंगबली हनुमानजी।

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हनुमान चालीसा सत्संग : नवंबर २०१७

नवंबर २०१७ माह का अंतिम रविवार दिनांक २६ को था। इस दिन आश्रम में सायंकाल हनुमान चालीसा सत्संग का मासिक कार्यक्रम था। कार्यक्रम का शुभारम्भ दास बगीची के भक्तों द्वारा सुन्दर भजनों से हुआ।  पूज्य गुरूजी के व्यास पीठ पर पधारने और उनके स्वागत के उपरांत श्री गुलाब चंद व्यास जी ने एक सुन्दर भजन (हरि को भेज ले प्राणी) प्रस्तुत किया और फिर सबने हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया। उसके बाद पूज्य गुरूजी का सवा घंटे का प्रवचन हुआ, जिसमे उन्होंने चालीसा की २२वें चौपाई – सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक कहु को डरना।। – पर प्रवचन किया।

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अपने उद्बोधन में पूज्य गुरूजी ने कहा की इस चौपाई में मनुष्य की दो अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रचलित आवश्यकताओं की पूर्ती के बारे में  गोस्वामीजी सूत्र प्रदान करते हैं। ये हैं सुख और सुरक्षा की प्राप्ति की इच्छा । वे कहते हैं की जो भी हनुमानजी की शरण में जाता है उसे सब प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते हैं – सब सुख लहै तुम्हारी सरना। और जब आप हमारे रक्षक हैं तो हमें किसी बात का डर नहीं है, अर्थात हम सुरक्षित भी हो जायेंगे। ज्यादातर प्रत्येक मनुष्य इन्ही दो आवश्यकताओं के बारें में चिंतित होता रहता हैं और यथासंभव जुगाड़ भी करता रहता है। लेकिन विडम्बना यह है की जीवन भर इस के लिए कार्य करने के बावजूद पर्याप्त सुख और सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है। हमारा प्याला कुछ खाली बचा ही रहता है। अतः यह बिंदु अन्यन्त गंभीर और विचारणीय है। यह तो हम सबके जीवन का ही प्रश्न है। अब सोचना यह है की हम हनुमानजी की शरण में जाएँ तो हमें यह दोनों कैसे प्राप्त हो जायेंगे, क्या देवता लोग ही किसी के जीवन में किसी चीज़ के भाव-आभाव के हेतु होते हैं, क्या किसी गरीबी आदि के किये भगवान जिम्मेदार होते हैं, और अगर हम उनके शरण में चले गए तो वे अपना आदमी देख कर हमें सुखी आदि कर देते हैं। भले दुनियां में हम ऐसा देखते हैं की किसी नेता अथवा सेठ आदि के साथ जुड़ जाएँ तो वे भी हमारी आवश्यकताओं को देख लेते हैं, लेकिन ईश्वर के बारे में ऐसा सोचना उचित नहीं है। हम अपनी आँख ठीक से खोले तो सब को दिखता है की हम सब पर ईश्वर की अपार कृपा बरस रही है। कमी हमारे तरफ से है। हमारा अभाव और असुरक्षा हमारे मन से समस्याएं हैं, जिसे हमें ही ठीक करना होता है। ऐसे अनेकानेक दृष्टांत दुनिया में विराजमान हैं जिन्होंने अपने जीवन में अनेकानेक समस्यों और अभावों के बावजूद ने साहस और बुद्धिमत्ता से अपने जीवन में उत्कर्ष उत्पन्न कर लिया। इसलिए हमारी शरणागति ईश्वर के कर्तव्य का विधान और निरूपण नहीं है, बल्कि हमारे मन में कुछ परिवर्तन का सूचक है। अगर देवता लोग भी किसी की व्यक्तिगत सेवा और शुश्रुषा के वजह से ही हमारी देख भाल  करते हैं तो वे भी स्वार्थ और राग-द्वेष से कलुषित हो जायेंगे और वे भी सामान्य व्यक्तियों की तरह विकारी हो जायेंगे। अतः शरणागति कुछ हमारे अंदर ही परिवर्तन की सूचक और औषधि है।

हम लोग जिसके भी प्रति शरणागत होते हैं उसके गुणों का अपने अंदर समावेश होने लगता है। वे स्वाभाविक रूप से हमारे आदर्श होते हैं। हम लोग स्वाभाविक रूपा से उनके आचार और विचार का अनुकरण करने लगते हैं, और इस तरह से उनके गुणों का समावेश अपने अंदर होने लगता है, और यह ही सबसे महत्वपूर्ण बात होती है। अब अगर हम हनुमानजी के प्रति समर्पित होते हैं तो उनके जैसी रामजी के प्रति शरणागति, साहस, निडरता, विनम्रता और बुद्धिमत्ता आदि देख कर, उसी रंग में रंगने लगते हैं। ईश्वर जब हम सब पर कृपा करते हैं तो हमें बिना कर्म के कोई फल नहीं देते हैं, वे हमें कर्म करने की कला और प्रेरणा देते हैं, और बाकि सब तो फिर स्वतः प्राप्त हो जाता है। अपने मन के परिवर्तन से वस्तुतः समस्या ही नहीं रहती है, और इस तरह से मनो हमारे प्रभु हम पर कृपा कर देते हैं। बस इसके लिए हमे शरणागति का रहस्य समझना चाहिए। वेदांत में जिसे निषेध कहते हैं उसे ही भक्ति शास्त्र में शरणागति कहते हैं। वेदांत कहता है की जब जीव-भाव का निषेध होता है तभी ब्रह्म-स्वरुप आत्मा का साक्षात्कार होता है। भक्ति शास्त्र शनै-शनै हमारे जीव-भाव को शिथिल करते हुए निवेदित करा देता है। अतः उसका रहस्य ठीक से जानना आवश्यक है।

शरणागति के छे अंग होते हैं। कहा गया है : अनुकुलस्य संकल्पः, प्रतिकुलस्य वर्जनं, राक्षिष्यति इति विश्वासः। गोप्तृत्वे वारणं तथा, आत्म-निक्षेप, कार्पण्ये, शरणागति षड्विधा। अर्थात हमारे इष्ट के लिए जो भी अनुकूल है उस अनुकूल कार्य को करने का निश्चय ; उन्हें जो भी अच्छा नहीं लगता है उस प्रतिकूल कार्य आदि से दूर रहना ; अपने मन में पूर्ण विश्वास होना की वे हमारी रक्षा करेंगे ; अपने इष्ट देवता को ही अपना पालक और स्वामी समझना ; उनके प्रति पूर्ण समर्पण होना, अर्थात जब भी हम उनकी सन्निधि में हों अथवा उनका स्मरण भी करें तब हमारे सब अभिमान समाप्त होते दिखाई पड़ें, अंदर तक एक हलकापना आ जाये, ये आत्म-निक्षेप है ; और अंतिम गुना सरलता और निरभिमानता का सूचक है। जिसमे भी ये गुण आते हैं वो ही शरणागति की साधना के पथ पे चलता है। ऐसा व्यक्ति न केवल अपने राग और द्वेष दूर करने लगता है बल्कि अभिमान को भी दूर करने लगता है। और साथ ही साथ अपने इष्ट के गुणों, ज्ञान, और भक्ति आदि को भी अपने अंदर समाविष्ट करने लगता है। इस तरह से उसका मन आमूल परिवर्तित हो जाता है। ऐसे मन में एक दिव्य शांति और सुख स्वाभाविक रूप से ही होता है। उसे किसी का भी डर नहीं रह जाता है, और वो अन्यन्त सुरक्षित महसूस करने लगता है। इस तरह से गोस्वामीजी की ये बात सार्थक हो जाती है की सब सुख लहे तम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना। हमारे भगवान् सीधे कुछ न करने के द्वारा कितना कुछ कर देते है, भक्त इस परिवर्तन का श्रेय भी अपने भगवन को ही देता है, और ज्यादा विनम्र और शरणागत हो जाता है। मन जितना शांत और निर्मल होता है, उतनी ही बुद्धि और विकसित होने लगाती है, और वो वेदांत प्रतिपादित जीव-ब्रह्म के रहस्य गहरायी से समझने लगता है और अपने प्रफु से अंततः एक होक जीता है – ऐसे व्यक्ति को तो परम सुख का अक्षय भंडार मिल जाता है और वो पूर्ण सुरक्षित भी हो जाता है। पूज्य गुरूजी ने अनेकानेक सुन्दर एवं सरल दृष्टांतों से ये सब बातें बताई।

अंत में सबने मिलकर प्रेम से हनुमानजी की आरती करी तथा प्रसाद ग्रहण कर प्रस्थान किया।

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हनुमान चालीसा सत्संग : अक्टूबर २०१७

अक्टूबर महीने का हनुमान चालीसा सत्संग का कार्यक्रम दिनांक  २९ अक्टूबर को वेदांत आश्रम के शंकराचार्य सभागृह में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का प्रारम्भ पूर्ववत सुन्दर  भजनों  से हुआ, और फिर सबने हनुमान चालीसा का पाठ  किया। तदुपरांत  पूज्य गुरूजी ने हनुमान चालीसा की २२ वीं  चौपाई पर अपना प्रवचन प्रारम्भ किया – सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक कहु को डरना। 

उन्होंने कहा की जो भी हनुमानजी की शरण में जाता है उसे सब प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते हैं, तथा उसके सब प्रकार के डर भी समाप्त हो जाते हैं। इस चौपाई में एक बहुत मूलभूत बात कही जा रही है।  एक तो प्रत्येक मनुष्य सुख और सुरक्षा प्राप्त करने के लिए सतत लगा रहता है, दूसरी बात यह है, की ये दोनों चीजें हमारे अभिमान के करना ही अप्राप्य हो जाती हैं, न की किसी बाहरी कारणों  से, और जैसे ही मनुष्य शरणागति की अंतःस्थिति को प्राप्त करता है फिर मनो जिसके प्रति वो शरणागत होता है वो देवता उसे इन दोनों जरूरतों को पूरा कर देता है। सुख और सुरक्षा की प्राप्ति का रहस्य शरणागति के रहस्य में छुपा हुआ है। स्वामीजी ने हनुमानजी के अनेकानेक भक्तों के दृष्टांत दिए जिन्होंने हनुमानजी के प्रति शरणागति के करना जीवन में अकल्पनीय सुख और समृद्धि प्राप्त की। उनमे गोस्वामी तुलसीदास जी भी शामिल हैं, आधुनिक काल में एप्पल कंपनी के स्टीव जॉब्स भी हनुमानजी के ऐसे ही भक्तों में एक हैं।  वे नैनीताल के पास स्थित नीमकरोली बाबा के आश्रम में रहे थे और बाबाजी हनुमानजी के बहुत बड़े भक्त थे, उनके जीवन में उनकी कृपा से बहुत बड़ा परिवर्तन आया।

जब तक मनुष्य मूलभूत सुख और सुरक्षा प्राप्त नहीं कर लेता है तब तक वह निःस्वार्थ नहीं हो पता है, और जब तक निःस्वार्थ नहीं होता है तब तक वो अच्छा और बड़ा सोच भी नहीं पता है।  इस लिए इन दोनों आवशयक्ताओं की पूर्ती जीवन के साफल्य के लिए अत्यंत आवश्यक होती हैं। पूज्य गुरूजी ने कहा की – शरणागति क्या होती है और कैसे करि जाती है – इस विषय में हम लोग अगली सत्र में प्रवेश करेंगे।

इसी दिन अभी दो दिन पूर्व समाप्त हुए गीता ज्ञान यज्ञ के उपलक्ष्य में एक भंडारे का भी आयोजन हुआ। विशेष प्रसन्नता की बात यह थी की उस दिन आंवला नवमी का शुभ पर्व भी था, इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा होती है और इसके निचे बैठ के भोजन भी किया जाता है। इसके बारे में कथा आती है की इस दिन आंवले के पेड़ में भगवन विष्णु और शिवजी दोनों का वास होता है। आश्रम में एक आंवले के पेड़ की व्यवस्था की गयी और उसकी पूजा की तैयारी भी की गयी, अनेकों भक्तों ने पूजा का आनंद लिया और सुंदरता से सजाय गए पेड़ की परिक्रमा की। बाद में श्री सुनील गर्ग जी के द्वारा सभी को भंडारे प्रसाद का आयोजन किया गया।

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